Thursday, 6 July 2017

Bheed Ka Dharm

भीड़ का धर्म 

क्या सोचा था हम ने, कि तुम वैसे बिलकुल नहीं हो,
तुम हो उन सब से मुख़्तलिफ़, उन सब से जुदा,
पर तुम तो वही थे, सड़कों पे उमड़ती भीड़ का एक हिस्सा,
पागल, अंधी भीड़ में 'मैं भी दो हाथ मार लूँ'
कह कर अपना गुस्सा, अपनी भड़ास, अपनी नफ़रत 
निकालने का मौका ढूंढता बस एक और आम इंसान, 
इंटरनेट की दुनिया का एक और वीर योद्धा,
तुम थे बस एक और अनजाना, अनदेखा चेहरा,
एक अजनबी चेहरा जो छुपा रखा था तुम ने,
धीर-गंभीर, सुशिक्षित मुखौटे के नीचे अपने,
मेरा मोहल्ला, मेरे लोग, मेरा देश, मेरा पानी,
मेरी ज़मीन, मेरी टाइम लाइन की सुरक्षा के लिए,  
अपनी सुविधा के हिसाब से चेहरा बदलते हुए,
खाना-पीना-कपड़े-संस्कार-संस्कृति-औरत-मर्द
भाषा-जाति-धर्म-अधर्म के सामाजिक द्वन्द के बहाने,
तिरोहित कर दिया मज़हब इंसानियत का तुम ने।  

पेड़ काटे जा रहे हैं, जंगल ख़त्म हो रहे हैं, 
डर है कि जंगली जानवर अब सिर्फ तस्वीरों में दिखेंगे, 
पर नहीं, जंगल तो अब शहरों में बस गए हैं, 
क्योंकि जंगली जानवर समो लिये हैं हम ने अपने अंदर,
क़ुदरत के नियमों को मानते जानवरों को कोसता है हर कोई
पर क़ानून की धज्जियाँ उड़ाता अपना वहशीपन किसी को याद नहीं।  
वातावरण गर्म हो रहा है, मौसम की हरकतें अजीबोगरीब,
प्रकृति की अति से है आज हर इंसान परेशां, 
पर दिखती नहीं हमें क़ुदरत के ख़िलाफ़ अपनी मनमानियां, 
प्रकृति की रक्षा, ये भी तो हमारा ही धर्म है,
पर विकास की अंधी दौड़ में अनदेखी हो चुकी हैं 
अपने ही वजूद को खतरे में डालती अपनी बेवकूफियां,
धर्म की उत्पत्ति किस मक़सद से हुई, याद नहीं अब किसी को,
सच तो ये है कि भीड़ का धर्म सिर्फ़ नफ़रत और हिंसा होता है, 
अपनी जड़ों को बचाने के लिए, उनकी जड़ों में ज़हर उड़ेलती हुई
भीड़ को सिर्फ़ अपने-अपने धर्म का नाम याद रहा, इंसानियत का धर्म कब का भूल चुका।  


 

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