Thursday, 20 July 2017

Zindagi Ka Hisab

ज़िंदगी का हिसाब

अनगिनत बहस-मुबाहिसे, बेहिसाब नफ़रतें
ताने, शिकायतें, इल्ज़ामात, तशद्दुदगर्दी,
धर्म-कर्म-मज़हब-जाति-प्रजाति-भाषा-ज़ुबान
कारण-वजहें-बहाने कुछ भी बन जाते हैं।
क्या कभी तनहाई में अपने अंदर झांक कर देखा है
कि तुम कौन हो, तुम्हारी असली पहचान क्या है?
क्या कभी फुर्सत से ज़िंदगी का हिसाब सोचा है?
कितनी नेकियां बटोरी, कितनी नफ़रतें बाँट दीं,
कितने उजाले समेटे, कितने अँधेरे बिखरा दिए,
हर सुबह की धूप और चांदनी रात के बावजूद?
कब-कैसे-कितने झूठ चुन लिए सच की पैमाइश में,
कितने रिश्ते महकाए प्यार-मोहब्बत की खुशबू से,
कितने रुख़सत कर दिए अपनी जुबां की तुर्शी से?
दुनिया के शोर में क्या कभी अपनी रूह के सन्नाटे को सुना है?
इंसानियत की ख़ुदाई नेमत को ख़ुलूस से क़ुबूल किया है?
ऐ भोले मानुस, घर का पता तो मालूम है, पर अपने असली ठिकाने की खबर है क्या?





Thursday, 6 July 2017

Bheed Ka Dharm

भीड़ का धर्म 

क्या सोचा था हम ने, कि तुम वैसे बिलकुल नहीं हो,
तुम हो उन सब से मुख़्तलिफ़, उन सब से जुदा,
पर तुम तो वही थे, सड़कों पे उमड़ती भीड़ का एक हिस्सा,
पागल, अंधी भीड़ में 'मैं भी दो हाथ मार लूँ'
कह कर अपना गुस्सा, अपनी भड़ास, अपनी नफ़रत 
निकालने का मौका ढूंढता बस एक और आम इंसान, 
इंटरनेट की दुनिया का एक और वीर योद्धा,
तुम थे बस एक और अनजाना, अनदेखा चेहरा,
एक अजनबी चेहरा जो छुपा रखा था तुम ने,
धीर-गंभीर, सुशिक्षित मुखौटे के नीचे अपने,
मेरा मोहल्ला, मेरे लोग, मेरा देश, मेरा पानी,
मेरी ज़मीन, मेरी टाइम लाइन की सुरक्षा के लिए,  
अपनी सुविधा के हिसाब से चेहरा बदलते हुए,
खाना-पीना-कपड़े-संस्कार-संस्कृति-औरत-मर्द
भाषा-जाति-धर्म-अधर्म के सामाजिक द्वन्द के बहाने,
तिरोहित कर दिया मज़हब इंसानियत का तुम ने।  

पेड़ काटे जा रहे हैं, जंगल ख़त्म हो रहे हैं, 
डर है कि जंगली जानवर अब सिर्फ तस्वीरों में दिखेंगे, 
पर नहीं, जंगल तो अब शहरों में बस गए हैं, 
क्योंकि जंगली जानवर समो लिये हैं हम ने अपने अंदर,
क़ुदरत के नियमों को मानते जानवरों को कोसता है हर कोई
पर क़ानून की धज्जियाँ उड़ाता अपना वहशीपन किसी को याद नहीं।  
वातावरण गर्म हो रहा है, मौसम की हरकतें अजीबोगरीब,
प्रकृति की अति से है आज हर इंसान परेशां, 
पर दिखती नहीं हमें क़ुदरत के ख़िलाफ़ अपनी मनमानियां, 
प्रकृति की रक्षा, ये भी तो हमारा ही धर्म है,
पर विकास की अंधी दौड़ में अनदेखी हो चुकी हैं 
अपने ही वजूद को खतरे में डालती अपनी बेवकूफियां,
धर्म की उत्पत्ति किस मक़सद से हुई, याद नहीं अब किसी को,
सच तो ये है कि भीड़ का धर्म सिर्फ़ नफ़रत और हिंसा होता है, 
अपनी जड़ों को बचाने के लिए, उनकी जड़ों में ज़हर उड़ेलती हुई
भीड़ को सिर्फ़ अपने-अपने धर्म का नाम याद रहा, इंसानियत का धर्म कब का भूल चुका।  


 

Wednesday, 5 July 2017

Eid Mubarak

ईद मुबारक़ 

आया आया आया, देखो चाँद नज़र वो आया 
देखो चाँद नज़र,
देखो देखो जी, चाँद नज़र वो आया। 
शाम से ही रेडियो पे ईद और चाँद के गाने बज रहे हैं। चारो ओर खुशियों की लहर है, रोज़ेदारों ने रोज़ा खोलने के बाद बाज़ारों की ओर रुख़ कर लिया है।  
पर सकीना की आँखों में खुशियों की आयत नहीं, नाउम्मीदी का खालीपन है। परली बिल्डिंग वाली मैडम ने कुछ पैसे एडवांस देने का वादा किया था पर दोपहर को जब वो उनके कपडे देने गयी तो उनके घर पर किटी पार्टी चल रही थी और उनके नौकर ने दो दिन बाद आने को कह कर उसे दरवाज़े से ही लौटा दिया। अब वो बेटी के लिए नए कपडे और सिवइयां कैसे लाएगी, ये सोच सोच कर ही उसका जी हलकान हुआ जाता था। 
ज्यादा पैसा कमाने के लालच में शौहर जब से बड़े शहर गया उसकी भी कोई खोज खबर नहीं थी। पहले तो सकीना ने कई महीने तक उसका रास्ता देखा, फिर जो भी कोई शहर जाता वो उसको आसिफ का फोन नंबर पकड़ा देती कि किसी भी तरह आसिफ का पता लग जाये और वो जल्द से जल्द घर वापस लौट आये। पर हर बार उसका फोन बंद होने की ही खबर मिली, ना उसके घर का कोई अता-पता था ना कंपनी का। अब तो सकीना ने उसका इंतज़ार करना छोड़ खुद ही पास की नयी कॉलोनी में कुछ घरो में सिलाई-कढ़ाई का काम पकड़ लिया था। एक मैडम को तो उसके हाथ की कढ़ाई इतनी पसंद आयी थी कि उन्होंने उसके सिले कुर्ते-साड़ी अपने बुटीक में बेचना शुरू कर दिया था। उन से भी पैसे एडवांस मिलने की बात तय हुई थी पर अब तो उनका घर ही नहीं, फोन भी बंद लग रहा था, बिलकुल सकीना की किस्मत की तरह। 
पर सकीना हार मानने वालो में से नहीं थी, ईद के मुबारक मौके पे वो अपनी बच्ची की आँखों में आँसू नहीं देख सकती थी। उसने अपना बक्सा खोला और ऊपर नीचे टटोलने लगी, कहीं कुछ तो होगा जो उसके काम का होगा। आह...यही तो चाहिए था उसे, बनारसी ज़री का वो लाल दुपट्टा जो उसने अपनी सगाई के दिन पहना था। झटपट अपनी सिलाई मशीन निकाल सकीना काम पे जुट गयी। तीन घंटे की मशक्कत का नतीजा उसके हाथ में था...उसकी बेटी की चमचमाती नई ड्रेस ! गोटा लगी इस ड्रेस में एकदम परी जैसी दिखेगी मेरी बेटी! 
'कुछ भी हो जाये, मैं अपनी बेटी का दिल कभी नहीं दुखने दूँगी।', सकीना ने मन ही मन ठान लिया था। 'ड्रेस का तो इंतज़ाम किसी तरह हो गया पर सिवइयां और बिटिया की ईदी कहाँ से लाऊँ? पड़ोस की चचीजान से सौ रूपये उधर मांग लेती पर वो भी तो अपने बेटे के पास दूसरे शहर गयी हुई हैं। बुटीक वाली मैडम से इतने सारे कपड़ों की सिलाई और कढ़ाई के पैसे मिल जाते तो सारी मुश्किल ही ख़तम हो जाती, घर के लिए एक-दो बर्तन और अपने लिए एक सादा सा जोड़ा बनाने के लिए भी कपडा खरीद लेती। अब कल ही तो ईद है और मैडम का कोई भरोसा नहीं कि कब वापस आएँगी।' सकीना को अपनी परेशानी का कोई हल नहीं सूझ रहा था। बिटिया की गुल्लक भी उसने पिछले महीने ही उसके स्कूल की फीस भरने के लिए तोड़ दी थी। अचानक उसे एक ख़्याल आया और वो अंदर भागी...पिछले महीने ऐसे ही किसी मुश्किल वक़्त के लिए चावल के डब्बे के नीचे छुपाया हुआ पचास का नोट! 
आख़िरकार सकीना ने इत्मीनान की एक गहरी सांस ली! बिटिया की ईदी और सिवईयों का इंतज़ाम तो हो गया, बाक़ी का अल्लाह मालिक़। 
अभी वो खाना बनाने उठी ही थी कि उसका फ़ोन बज उठा। 
'हैलो मैडम जी, मैं आई थी आप से मिलने पर आप के घर पर ताला था और आप का फोन भी बंद था।' 
'सकीना बी, आप अभी तुरंत बुटीक पर आ जाइये।'मैडम ने थोड़ी तुर्शी से कहा। 
'इस वक़्त? क्या हुआ मैडम जी?' सकीना बी थोड़ा घबरा गयी थी। 
'आप आइये सकीना बी, तभी बात करेंगे' कह कर मैडम ने फोन बंद कर दिया। 
सकीना बी ने जल्दी से सोई हुई बेटी को गोदी में उठाया और बुटीक के लिए रिक्शा पकड़ लिया।  'ये पचास का नोट तो रिक्शा भाड़ा पे ही कुर्बान हो जायेगा, ऊपर से मैडम जी भी नाराज़ लग रही हैं, ना जाने क्या गलती हो गयी मुझ से' सकीना बी के मन में कैसे-कैसे ख़्याल घुमड़ रहे थे। 
'अरे ये क्या? ये बुटीक में इतना अँधेरा क्यों है? मैडम इतनी जल्दी बुटीक बंद कर के घर चली गयी क्या? पर मुझे तो यहीं आने के लिए कहा था! गेट तो खुला है! मैडम, शीला, रजनी.... कहाँ हैं आप सब? ये लाइट को क्या हुआ?' सकीना बी एक सांस में ही बोलती गयीं। 
'ईद मुबारक सकीना बी!' की अँधेरे में डूबे बुटीक के एक कोने में एक लैंप जला और फिर धीरे-धीरे हर कोने में शमा रोशन होने लगीं। 
'ईद की बहुत बहुत बधाइयाँ सकीना बी!' मैडम आ कर हैरान-परेशां खड़ी सकीना बी के गले लग गयीं, 'लीजिये आपकी ईदी और कुछ मिठाईयां। वैसे हम ने सिवइयां भी बनाई हैं, शायद आपके जैसे अच्छी तो ना बनी होंगी पर खा कर देखिये। और ये बिटिया के लिए एक छोटा सा तोहफ़ा, अब तो स्कूल जाती है तो नया बैग देख के इसको बहुत ख़ुशी होगी!'
'बहुत-बहुत शुक्रिया, मैडम!' सकीना की आँखों से झर-झर आँसुओं की झड़ी लग गयी। 'आप ने तो हमें इतनी ख़ुशी दे दी जो हमें आज तक ना मिली थी! और एक हम हैं जो ना जाने क्या-क्या सोच रहे थे! हमें तो लग रहा था कि इसका बाप तो पहले ही हमें छोड़ कर चला गया, अब आप ने भी पैसे देने का वादा कर के हमें धोखा दे दिया और अब हम अपनी बच्ची को ईद की ख़ुशी कैसे दे पाएंगे। पर मैडम, आप तो खुदा का फरिश्ता निकलीं!'
'नहीं सकीना बी, ये तो बस आपकी मेहनत और भलमनसाहत का ही फल है। हमें तो हर त्योहार सब के साथ मना कर  ख़ुशी मिलती है, फिर चाहे वो ईद हो, दिवाली- होली हो या क्रिसमस।' मैडम ने बच्ची को गोद में उठाते हुए सकीना की पीठ थपथपा दी। 
'आप बहुत अच्छी इंसान हैं मैडम। बस एक गुज़ारिश है, अगर आप सब बुरा ना माने तो कल आप सब अगर ईद की खुशियां बांटने हमारे घर आएंगे तो हमें बेहद ख़ुशी होगी।'
'आंटी, आप सब हमारे घर ज़रूर आना।' मैडम के गले लगते हुए सकीना बी की छोटी सी बिटिया ने भी ईद का न्योता दे दिया। 
'अरे मेरी नन्हीं परी, हम ज़रूर आएंगे। क्यों शीला और रजनी, तुम दोनों भी मेरे साथ सकीना बी के घर ईद मनाने चलोगी ना?'
'मैडम, ये हमारी ज़िंदगी की सबसे अच्छी ईद होगी...आप लोगों के साथ, वो भी हमारी अपनी मेहनत की कमाई से मनाई जाने वाली पहली ईद!' सकीना बी की नम आँखों में चाँद-तारों की रौशनी झिलमिला रही थी। 

स्याह आसमाँ में उमड़ते घनेरे बादलों की छाया थी, फिर भी,

माशा-अल्लाह, क्या ख़ूबसूरती से ईद का चाँद नज़र आया है। 
ईद मुबारक!