Friday, 29 April 2016

कुछ साल पहले तक, मने अब आप ये मत पूछिएगा की कितने साल, बस हमारे बचपन की ही बात है.....गाँव -खेड़े-कसबे के लड़कों का मनपसंद टाइम पास होता था ढलती रात में चुपके से स्ट्रीट लाइट के पीली रौशनी वाले बल्ब तोडना। कभी इस मोहल्ले के कभी उस मोहल्ले के।  बस शर्त ये होती थी की कोई भी अपने गैंग के मोहल्ले के बल्ब नहीं तोड़ेगा। नए छोकरों को तो ख़ास हिदायत दी जाती थी...... देख बेटा, मेरा मोहल्ला और खास तौर पे मेरे घर के सामने के बल्बों से दूर ही रहियो। और जो किसी नामाकूल ने गुस्ताख़ी की तो उसके ऊपर तो मानो क़हर बरपा हो गया।
कुछ यही हाल आजकल के फेसबुकियों का है। भाई मेरी टाइम लाइन पे कोई गाली-गुफ्ता ना करियो, ज़रा तमीज से कमेंट लिखियो वरना......
हाँ भाई क्यों ना........गली गलौज का सारा हक़ तो तुम्हे ही है ना! मने तुम सारी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पे अश्लील, भद्दी भाषा में अपने विरोधियों को लताड़ते रहो तो ठीक है, उनके उलटे-सीधे मेम बना के जगह-जगह चिपकाते  रहो, पर जो कोई तुम्हारे दीवार पे कोई चित्रकारी कर दे, कुछ लिख-पढ़ दे तो तुम्हें तक़लीफ़ हो जाती है। उसे तुम फटाक से तड़ीपार यानि ब्लॉक कर दोगे।
क्यों?
क्योंकि तुम्हे अपना घर, अपनी दीवार, अपना मोहल्ला साफ़ सुथरा रखना है पर दूसरों के दरो-दीवार पे कालिख पोतने में तुम्हे कोई गुरेज़ ना है।
वाह रे स्वच्छ भारत प्रेमियों, साष्टांग प्रणाम है तुम्हें !