Sunday, 25 December 2016

मुझे खुद अपनी ज़रूरत है!
फिर आज वही प्यार भरी बाते, वही वादे
हम अपना ख्याल रख सकते हैं
पचास का पाला छू रही हो,
आप बस अपना ध्यान रखो,
सब अपनी ज़िन्दगियों में व्यस्त हो गए,
और उन्हें लगता है मैं ने बहुत काम कर लिए,
अब तो मेरे आराम करने के दिन हैं।
सबको लगता है अब उम्र हो चली है,
क्या वाक़ई?
सब कहते हैं आधी उम्र बीत चुकी
ज़िन्दगी के दिन-महीने-साल सिमट रहे हैं
अब तो बस खुद को समेट लो।

हाँ वाक़ई आधी उम्र तो बीत चुकी
पर आधी ज़िन्दगी तो अभी बाक़ी है,
कितने खूबसूरत लम्हे जीना अब भी बाक़ी है!
क्यों लगता है किसी को अब परवाह नहीं
मुझे तो मेरी, मेरी रूह की परवाह है
क्यों मान लूँ किसी को मेरी ज़रूरत नहीं
जबकि मुझे तो खुद अपनी ज़रूरत अब भी है!
तो सुबह की पहली चाय के साथ अब रूख़े अख़बार नहीं
अरिजीत के मख़मली सुर, फैज़ और गुलज़ार की नज़्में
सर्द हवा में थरथराते पत्तों पे नर्म ओस की बूंदे
कुहसाये आसमान से झाँकते सूरज की सिन्दूरी लालिमा

दानों की तलाश में मुंडेर पे फुदकती चिड़ियों की चूँ चूँ
डाल-डाल पे कुलांचे भरती गिलहरियों की चिट चिट
मधुमालती, मोगरे, गुड़हल, गुलाब को मोहती तितलियाँ,
ज़िन्दगी के इन्ही रंगों-ख़ुशबुओं को रूह की गहराइयों में समोती मैं
मेरा दूरदर्शी साथी-मेरा कैमरा और मेरी कलम,
चुन लेती हूँ बस इनके साथ कुछ नयी मुस्कुराहटें,
बुनती हूँ चंद नए छंद, गढ़ लेती हूँ नयी-पुरानी कहानियां,
रुपहली चांदनी के रहस्यमयी साये तले
टिमटिमाते तारों से जगमगाते आसमान में,
ढूँढ लेती हूँ कुछ अनचीन्हे गीत, कुछ नयी ग़ज़लें
व्याकुल पपीहे के विरही प्रणय गीत में,
रात की रानी की मनमोहिनी गंध में,
ढलती अंधियारी रात के गूंजते सन्नाटे में
छुपा लेती हूँ अलसायी पलकों में कुछ सपने नए,
टप-टप टपकती बारिश की बूंदो में

कलकल बहते पानी में तैरती क़ाग़ज़  की नावों में ,

कैमरे के लेंस और कीबोर्ड पे मचलती उंगलियों से
सहेज लेती हूँ चंद और मुस्कुराहटें अपने लिए,
जी लेती हूँ हर पल कुछ बेशकीमती लम्हे
और समेट लेती हूँ बस यूँ ही बची हुई आधी ज़िन्दगी अपनी
क्योकि मुझे.......अब भी अपनी ज़रूरत है!

Saturday, 17 December 2016

UNDO THE SHACKLES 

Lost in her grim thoughts she plodded on,
Plenty of nights already spent in mourn,
Firm steps, bright, gleaming, resolute eyes
Nimble fingers, but a confident head held high.
A dusty pavement, gravel dotted, a rickety table,
Hot winds, under a blooming gulmohar tree
With thin threads she anchored herself, without a tremble,
Soon her old sewing machine got her, her first fee.
Just like Gandhiji's three famous monkeys
They had turned a deaf ear, a blind eye,
A still tongue, they turned away with ease,
Beaten black and blue, she let out a piercing cry,
When her husband-the 'pati parmeshwar'
Mauled her body, crushed her soul every night
Made her bow down and cower,
Set afire her dreams of a future bright.
He is your God, he's your 'swami',
What if he slaps you, he's not barmy.
Keep him happy, do not fight back and jeer,
It's a family matter, we will not interfere.
Banged and pushed against the wall
She was repulsed, she was devastated,
Ultimately she stood up and made the call
They came, the 'parmeshwar' was arrested.
She's so stupid, she's such a duffer,
For such petty things she had no tolerance,
Let her now rot in hell, let her suffer,
For her rebellion, there was no allowance.
A lone woman,l let's see how she will live now,
Without her man, she can't survive,
She raised her voice, she stooped so low,
Let's see how she will thrive!
Detested and despised for her impropriety,
She was isolated by a callous society,
That taunted and challenged her for low self-esteem,
Till she broke the shackles, to assert herself and her dreams.

Saturday, 1 October 2016

Hi guys, am sharing here the short story which fetched me the Muse Of The Month-September prize by the women's online portal, @Women's Web.
http://www.womensweb.in/2016/09/confident-gaze-fight-rape-culture/

THE NEW ROAD TAKEN

She reached the school. Stood there at the gate. Looked around at the hep students. At their piercing eyes. She retraced her steps from the school.
She reached the sports ground. Looked at the boys kicking football through the fence. Heard their taunts and jibes. She retraced her steps from the stadium.
She reached the institute. Looked at the smartly turned out receptionist, the fashionistas. Squirmed at their scornful glances. She retraced her steps from the acting institute.
She reached the factory. She asked for a job, any job. Looked at the greedy glint in the manager's eyes.She retraced her steps from the factory.
She reached the streets. Head down, her wet eyes rained droplets on the tar covered hot black roads. 'Kya hua, what happened, need some help?' they gathered around her-the vultures eyed the new prey hungrily.
She did not dare to raise her eyes, she did not dare to look at their lecherous eyes. She retraced her steps.
She changed her course. They still taunted her. They still scorned her.
She changed her path. They still gathered around her. They still followed her. They still leched. They still touched her......the uncles, the bhaiyas, the friends, the managers, the repulsive goons on the streets.
She fought back.
They did not retrace their steps!
She went to the police. Looked at them with hope. She pleaded with them to listen to her plight, she appealed to them for help. They laughed at her, called her delusional. They told her to 'adjust'. Men will be men, they said.
She retraced her steps.
She went home, to seek solace in the warm lap of her parents., to let herself a few deep breaths of safety and peace. She sought refuge in her home where she could claim a few moments of freedom.
They did not retrace their steps-the sexist society. They said she had invited them, the vultures were innocent.
They did not retrace their steps-the savage media. They called her a slut, a shameless woman.
They retraced their steps-her loving family. They said she had sullied the family's honor. They told her to go, anywhere. Or better still, die.
She reached the shore, to cleanse her name in the depths of the sullied waters. To seek freedom, from everything, from everyone.
“It was a choice that turned in another direction from the freedoms she had so often longed for and fought for.” 
She looked at the swirling muddy waters. The swollen river stared back. It questioned her choice. It refused to give her the 'freedom' she desired, in her womb.
The river retraced her steps.
The girl retraced her steps. She changed her direction. She walked on, head held high, a confident gaze shot back at the piercing, mocking, questioning, lecherous eyes.
Firm steps trod a new road, road to freedom.







Tuesday, 27 September 2016

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी

इतवार का दिन, दरियागंज की सड़कें और वहाँ क़ी फ़िज़ा में फैली वो नयी-पुरानी किताबों की खुशबू........हर इतवार सुबह की सैर के बाद अनायास ही उसके पाँव उस तरफ बढ़ जाते। जब तक हाथ में हिंदी-अंग्रेज़ी की दो-चार किताबें, और कभी-कभार तो संस्कृत, जर्मन की भी, ना आ जाएं तब तक पाँव वापस जाने को उठते ही ना थे। जाने क्या था इन किताबो के ढेर में जो उसे हर इतवार वहाँ खींचे लाता था।  अब तो घर वालों ने भी पूछना बंद कर दिया था। माँ ज़रूर कभी कभी परेशां हो कर बोल देती थी कि जाने कहाँ से क्यों कूड़ा-कबाड़ उठा लाता है, सारी अलमारी-कमरे भर चुके हैं पर इसका पागलपन नहीं ख़त्म होने को आता !
'आइये सर जी, आज बहुत सी नयी किताबे आयी हैं, आप ही छांट लीजिये पहले,' उसे देखते ही उसके प्रिय दूकानदार ने आवाज़ मारी. उस रोज़ भी वो हर बार की तरह पुराने उपन्यासों के ढेर से अपने प्रिय लेखक की किताबे ढूंढने लगा ही था कि उसके हाथ मटियाले पन्नों के बीच ही ठिठक गए। धुंधलाई सी स्याही के ऊपर ये क्या लिखा था........?
वही गोल अक्षर, वही शब्द रचना और वही उसका नाम!
'नहीं, ये वो नहीं हो सकती।' उसने सर को झटका दिया और जैसे ही किताब को ढेर में वापस रखने लगा की सर्र से कुछ नीचे गिरा...... भूरा पड़ चुका सूखा हुआ लाल गुलाब! नीचे गिरते ही सारी पत्तियां छिटक कर बिखर गयीं पर बिसराई यादो का तो जैसे तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था......'वो मुझ से प्यार करती है, वो मुझ से प्यार नहीं करती' के चक्कर में जाने कितने गुलाब बलि चढ़ गए थे पर उसकी कभी हिम्मत ही ना पड़ती थी कि वो गुलाब उसकी नाज़ुक नर्म उंगलियों में थमा के अपने प्यार का इज़हार कर सके।
दूसरे साल के इम्तहान के बाद कॉलेज का आखिरी दिन था जब सांझ के धुंधलके तले कैसे-कैसे उसने हिम्मत जुटाई थी उसके कमरे तक जाने की। उसके पीजी से कुछ सौ मीटर दूर उसके कदम थम गये। 'आज मैं उस से सब कह दूंगा' सोचते-सोचते उसे दस मिनट हो चले थे, हिम्मत जवाब देने लगी थी कि उसके कमरे का दरवाज़ा खुला। एक हाथ में किताबो का झोला और दूसरे में एक पुराना सा सूटकेस। दोनों फर्श पर रख कर वो वापस मुड़ गयी, शायद और कोई सामान बाकी रह गया था।
'कह दूं, नहीं रहने दो वो नाराज़ हो गयी तो' की कशमकश के बीच ही उसके मनपसंद लेखक की ये किताब और लाल गुलाब उसके सूटकेस के ऊपर रख कर वो जल्दी से वहाँ से खिसक लिया था। पास की ही एक दुकान के बाहर बेचैनी से सुट्टा फूंकते हुए उसे रिक्शे में सामान रख कर जाते देखता रहा था वो। 'किताब का क्या हुआ होगा, क्या गुलाब देख कर उसे मेरा प्यार कुछ समझ आया होगा? या उसने वो गुलाब डस्टबिन में फेंक दिया होगा?'
वो आखिरी पल था जब उसने उसे नज़र भर देखा था। तीसरे साल की पढ़ाई करने वो वापस कॉलेज आई ही नहीं। सहेलियाँ ज्यादा उसकी थी नहीं, बस कहीं से उड़ती खबर मिली कि उसके पापा ने उसकी शादी तय कर दी थी।
'ये ना थी हमारी क़िस्मत कि विसाले यार होता' पे हर रोज़ दो अश्क़ टपकाते हुए भी उसने किसी तरह पढ़ाई पूरी की और दो साल में ये सरकारी नौकरी लेकर दिल्ली आ गया। फिर हर संडे वो और दरियागंज की गलियाँ.......जाने कौन अनचीन्ही सी हसरतें, कौन सी कसक थी दिल में जो उसे खींचे लाती थी यहाँ।
आज उन सारे अनुत्तरित सवालो के जवाब उसे मिल तो गए पर कितनी देर के बाद......
का़श उस दिन हिम्मत जवाब ना दी होती! दिल की कसक अब हूक बन कर उसे धिक्कार रही थी। 'भइया, ये किताब दे दीजिए,' गुलाब की पत्तियों को धीरे से सहेज कर किताब के पन्नों में वापस रखते हुए वो बोला।
'आज बस एक ही किताब लेंगे साहब?'
'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां फिर भी क़म निकले'.....ये एफ़ एम वाले क्या दिल की हूक पढ़ना भी जानते हैं! आज बरसों बाद फिर एक बार आंखों से टपकते दो अश्क़ उसने नज़र चुरा कर पोंछ लिये और वापस मुड़ लिया।
'भाई साहब, वो किताब जो मैं दो दिन पहले दे गयी थी, उसे लेने कोई आया क्या? वही मीठी आवाज़....फ़िर एक बार!
तुम आये तो हवाआें में इक नशा है,तुम आये तो फ़िज़ाओं में रंग सा है, ये रंग सारे हैं बस तुम्हारे और क्या और क्या......ये ऐफ़ एम वाले वाक़ई जादूगर हैं, दिल की आवाज़ सुनना जानते हैं!

Monday, 12 September 2016


नया सियापा!

चलो आज फिर कुछ नया करते हैं, एक नया सियापा!

कुछ पुराना, पर फिर भी कुछ मासूम दिल के करीब सा,
कुछ नयी शरारतें, फिर भी हों वही बचपन की आहटें,
रात ढले की चुटर-पुटर चुगने वाली भूख से किचेन में धावा बोलना,
कुछ खट्टे-मीठे-तीखे की तलाश में सारे डब्बे उलट-पुलट कर देना,
माँ के 'मिर्च' लेबल वाले डब्बे से लड्डू का बचा-खुचा चूरा चुराना,
और कुछ नहीं तो नमकीन में हरी मिर्च-प्याज़ के स्पेशल तड़के पे चटखारे मारना,
दूर कहीँ चौकीदार के खौ-खौ वाले 'जागते रहो' की नक़ल लगाना,
और नरम ओस तले दूर नीले आसमान में 'मिल्की वे' और ध्रुव तारे को ताकना,
उनींदी आँखों को मलते-मलते भी अंत्याक्षरी वाले गाने का सुर पकड़े रहना,
''अरे सो जाओ, क्या खी खी लगा रखी है'' वाली डाँट का इंतज़ार करना,
आखिरकार सूरज के पहली किरण के साथ ही अलसाई आँखों में नींद समा जाना।
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अरे ये नया सियापा है क्या!

नया सियापा....

यानि कि परदेश में बैठे किसी विदेशी 'फ्रेंड' या पड़ोस वाले शर्मा अंकल की बेटी से 'चैटियाना',
माँ के सवालो की जगह Quora पे अजनबियों के प्रश्नों पे जवाब पोस्ट करना,
धुंधलाए नीले आसमान को छोड़ नीले स्क्रीन पे मिल्की वे तलाशना,
हर हफ़्ते एक नया-नवेला गेम डाउनलोड करना,
कभी फार्मविले में फसल उगाना तो कभी जीती जागती खूबसूरती की बजाय कैंडी पे क्रश होना,
कभी अपनी किताबो की जगह पोकेमॉन की तलाश में रात-बेरात मीलों दूर निकल जाना,
देर रात वाली छोटी भूख के लिए छोटी मैगी में हरी मिर्च-प्याज का तड़का लगाना,
नर्म ओस वाली चारपाई की बजाय नर्म गद्दे पे लोट कर एयरकंडीशंनर की हवा खाना,
उनींदी आँखों को मलते-मलते भी जैज़, रॉक, रैप के सुर पकडे रहना,
और ''अरे सो जाओ, क्या शोर मचा रखा है'' वाली डाँट का इंतज़ार करना,
आखिरकार सूरज के पहली किरण के साथ ही अलसाई आँखों में नींद समा जाना।

यही तो है आज का नया सियापा!








Tuesday, 6 September 2016

An Open Heartfelt Letter To My Son

Since this is in fashion these days, why should I not write an open letter! Everybody writes to their daughters, for a change I choose to write to my son.........so what if I am not a celebrity and he is away in Europe! Email and Facebook and Blogger hai naa..... 
So here I go.........inspired by the Big B Amitabh Bachchan sir!
An Open, Heartfelt Letter To My Son
My very dearest son,
You carry a valuable legacy on your strong shoulders, that of being a man in India-the diamond of the khandan, the 'sun' which illuminates the fortunes of the family!
Both your grandfathers are engineers and you chose to follow in their footsteps to keep the flag aloft, as did your sister too. I chose to follow my mom and took up teaching. And your dad became a senior govt officer. Were we, in our time, expected to carry forward the legacy of our parents? Not really!
But isn't this the norm in our society? To expect people to toe the line of our ancient customs and traditions?
Now because you are a man, people will force their thinking, their opinions, their boundaries on you.
They will tell you that men are strong, men don't cry, men are the providers and men must be the protectors.
Don't let yourself be trapped within these narrow boundaries. Don't let others decide what you can do and what you can not. Make your own choices in the light of your wisdom.
Don't let society's ''do's and don'ts for men'' govern you.
Not just carry your laptop bag to office, use your strong shoulders to carry grocery and vegetable bags from the market, carry your plate and coffee mug to the kitchen and wash them, pick up your soiled towel and hang it outside to dry, extend your 'strong' hands to cooking, washing and cleaning up around the house voluntarily, not just when you are asked to help.
Cry when your child is born, if you so wish. Shed a few tears when you lose a loved one if you are overwhelmed with grief.....it's ok, you will still be strong.
People will talk. They will mock you for being a 'cry baby'. You may be called a henpecked husband, a 'joru ka gulam'. Don't let the stupid notion of 'chaar log dekhenge to kya kahenge' affect how you express your joy and grief.
This may be a tad difficult....demanding an equal partnership in the socalled woman's domain, taking equal responsibility in 'her' kitchen and 'her' home and making her equal partner in all financial and family matters too, defying the age old cultural and social norms.
But I believe that it is sensible young men like you who can and who will change these deeply entrenched perceptions.
It may not be easy, extending your boundaries, exercising your own choices, rising above the thoughts and beliefs of the 'chaar log'.
Shrug off the baggage of this one legacy....of being a 'man'.
Be yourself. Be an equal, at home, at work, on the streets.....and you would have done more for yourself than I could ever do.
With you always, with all the love,
Your Mom

Saturday, 13 August 2016


झंडे का फंडा 

एक हैं हमारे पडोसी, मने होते तो सबके हैं पर ये वाले कुछ ख़ास हैं। निहायत ही धार्मिक क़िस्म के इंसान हैं, भगवान से डरने वाले। पूजा-पाठ, व्रत-उपवास में इनकी काफ़ी श्रद्धा है। घर में काफ़ी बड़ा और सुन्दर सा मंदिर बनवाये हैं जिसमे देश के हर कोने के भगवानों की बड़ी-छोटी मूर्तियां सजी हैं जिनके आगे चौबीसों घंटे दिया जलता रहता है। ख़ुदा-ना-ख़ास्ता यदि किसी दिन दिए का तेल ख़त्म हो गया तो फिर तो पत्नी घूंघट में और बच्चों के गोरे-गोरे गाल दो-तीन दिन तक लाल ही दिखाई देते हैं। ख़ैर, ये भाई साहब रोज़ बिना नाग़ा दूकान जाने से पहले दोपहर एक-दो बजे सूरज देवता को जल चढ़ाने आते हैं और भले ही देर रात बारह-एक बजे भी घर पहुंचे पर अपने भगवन के आगे घंटी बजाना नहीं भूलते। भई, इष्ट देवता नाराज़ हो गए तो!
और इधर एक हम हैं जो गाहे-बगाहे कैलेंडर से झांकते हुए भगवान जी के आगे हाथ जोड़ कर, मंगलवार को हनुमान जी को प्रसाद चढ़ा कर और साल में दो बार नवरात्री में व्रत रखकर ही धर्म-कर्म में अपनी आस्था दिखा लेते हैं। 
वैसे ये भाई साहब अकेले ना हैं, ऐसे तमाम लोग हैं हमारे मोहल्ले में जो नियम से हर रोज़ मंदिर जाते हैं, माता की चौकी, जागरण, भंडारा वग़ैरा भी करते रहते हैं। तीर्थयात्रा पे खुद भी जाते हैं और अन्य भक्तों को भी उत्साहित करते रहते हैं। 
अभी दो दिन पहले ही कुछ पड़ोसी हमें भी ले गए अपने साथ, अरे वो दो कॉलोनी छोड़ कर एक नया मंदिर बना है ना, वहां भगवान जी की 50 फुट ऊंची मूर्ति स्थापित की गयी है तो वही दिखाने ले गए थे। अब अपनी कॉलोनी का मंदिर भी कोई छोटा-मोटा तो है नहीं, तो हम उनसे पीछे क्यों रहें?
वहीं से लौट रहे थे तो रेड लाइट पे हर साल की तरह नन्हे-मुन्ने बच्चे तिरंगे बेचते दिख गए। हम ने भी जल्दी से एक बच्चे से पचास रुपये में पांच झंडे खरीद लिये, चलो उसे एक वक़्त का खाना तो मिल ही जायेगा। मुड़ कर देखा तो भाई साहब एक आदमी से मोल-तोल कर रहे थे। हम ने कहा, भाई साहब ले लो, दस रुपये के लिए क्या बहस कर रहे हो। भाई साहब ने तड़ से हमें डाँट लगा दी, 'अजी वो दस रुपये वाला तिरंगा आप को ही मुबारक़, हम वो दो कौड़ी का छोटा सा झंडा ना खरीदेंगे, देश भक्ति का मामला है, पचास फुट वाला ही लेंगे, देखने वालों को भी तो पता चलना चाहिए, आख़िर हम किसी से कम राष्ट्रभक्त नहीं हैं।' और मुड़ गए खिड़की पे, 'ऐ भाई लाइट हरी होने वाली है, जल्दी से ठीक रेट लगा, हज़ार-वज़ार छोड़ मैं पांच सौ से एक रूपया ज्यादा ना दूंगा और पचास फुट वाला ही लूँगा, देश के लिए तू इतना नहीं कर सकता !
हैं! मूर्ति की ऊँचाई से ईशभक्ति और झंडे की लंबाई से राष्ट्रभक्ति कब से नापी जाने लगी?
अब हम तो लाजवाब हो गए, आगे आप ही समझिये .......जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ।

image courtesy: allpicts.in


Friday, 22 July 2016

लगता है आजकल सभी राजनीतिक पार्टियों की ग्रह दशा कुछ ठीक नहीं चल रही है। All of them seem to be moving on a self-destruct mode.....
एक उत्तर प्रदेश बी जे पी के (अब निवर्तमान) उपाध्यक्ष दयाशंकर हैं जो पद सँभालने के नए-नए जोश में बी एस पी वाली बहनजी को अपशब्द कह जाते हैं, होहल्ला मचता है और दयाशंकर जी के ऊपर उनकी पार्टी की दया हो जाती है, यानि न सिर्फ़ उनको पद और पार्टी दोनों से निकाल दिया जाता है बल्कि उनके खिलाफ़ एफ़ आई आर भी हो जाती है. अगले ही दिन बहनजी/माया की देवी मायावती जी के भक्त उनके सम्मान की रक्षा के लिए धरना-प्रदर्शन करते-करते दयाशंकर जी के परिवार की महिलाओं के लिए ही अभद्र भाषा में नारे लगा देते हैं. बहनजी, बजाय अपने भक्तों की मज़म्मत करने के, उनकी हरकतों को ये कहकर जस्टिफाई करती सुनाई देती हैं कि ये सब तो दयाशंकर को समझाने के लिए बोला गया है ताकि वो या कोई और नेता भविष्य में ऐसी हिमाक़त ना करे, ख़ास तौर पे देवी मायावती जी के ख़िलाफ़। अब दयाशंकर की पत्नी ने उल्टा मायावती जी और उनके तथाकथित समर्थकों के खिलाफ ही ऍफ़ आई आर की धमकी दे दी है.
तो माना जा सकता है कि बी जे पी नेता की बेवकूफ़ी से अगर बी जे पी की चुनावी महत्वकांक्षाओं पे तुषारापात हो गया था तो बी एस पी के नेताओं ने अपनी मूर्खता से अपने ही पैरों पे कुल्हाड़ी मार ली है!
खैर.........उसी वक़्त जब संसद में जबरदस्त घमासान चल रहा था, हर तरफ से आरोप-प्रत्यारोप के तीर चल रहे थे, प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार, हर छह महीने में छुट्टी पे जाने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जी ना जाने कितनी दूर के सुहाने सपनो की दुनिया में मटरगश्ती करते नज़र आये. पर इनकी वफ़ादारी की मिसाल तो देखिये......महिला सम्मान की रक्षा के लिए लड़ते-लड़ते कांग्रेसी नेता अपने राजकुमार के सम्मान की रक्षा करना ना भूले . किसी ने कहा कि वो तो मोबाइल में कुछ देख रहे थे तो किसी और ने कहा, ''नहीं जी, इतने शोर में कोई सो सकता है क्या? वो तो अपनी आँखों को आराम दे रहे थे, दरअसल इतनी धूप में आँखे ड्राई हो जाती हैं तो हम जब अंदर एसी हॉल में आते हैं तो अपनी आँखें बंद कर लेते हैं ताकि आँखों की नमी लौट आये! ''
वाह वाह......... इतना प्यार देख के वाक़ई हमारी भी आँखें नम हो गयी हैं!
चलिए आगे बढ़ते हैं........ एक हैं आम आदमी भगवंत मान जी जिन्होंने अपने वोटरों से किये चुनावी वादों की चिंता में अपने राजनीतिक करियर की ही चिता चुन ली लगती है! मान जी ने एक विडियो बनाया निहायत मनमाने तरीके से, वो भी संसद के अंदर जाने के रस्ते का और ऐसा करते हुए उन्होंने उन सब सुरक्षा इंतज़ामों को भी शूट कर डाला जिसको दिखाने पे बैन है. लो झेलो अपने खिलाफ़ विशेषाधिकार हनन का केस.... और ज्यादा किस्मत की मार पड़ी तो एक एफ़ आई आर भी!
अब इसे ही तो कहते हैं आ बैल मुझे मार......come, 'shoot' me!
कहाँ हो साहिब-ए-आलम कबाली......अब इन बदक़िस्मत महानुभावों को आप ही बचा सकते हो ख़ाली!

Thursday, 21 July 2016




THE UMBRELLA BOY

I saw him at a distance at the traffic signal, completely drenched, holding multicolored umbrellas in all sizes and designs. He would go to each car, auto, bike and passerby and plead with them to buy his umbrellas. They would hardly spare him a glance, many would simply look through him or glare at him to take away his dirty body from them or their cars. There was something in his demeanor that attracted me to him even from a distance. 
I was afraid the light would turn green again before he reached me. And it did. Impatient honking of horns compelled me to start my bike and move ahead. As I negotiated my bike through the maze of vehicles I saw him jump into a cesspool trying to avoid being hit by a swerving biker. Unfortunately that jump splashed mud and water not only on him but the biker too. He stopped his bike, hurled an abuse and flung a tall leg towards the boy throwing him headlong into the back flowing gutter water. Not caring to see where his cruel push had landed the boy, or if he was hurt, the biker nonchalantly revved up his bike and sped away. The boy picked himself up swiftly, unmindful of the trickle of blood from his sullied cheek. He gathered the soiled umbrellas in his arms just as a mother would pick up her hurt child...even a steady drizzle from the skies couldn't hide another steady drizzle from his eyes. 
I couldn't just ignore his despondent, tear filled eyes. I stopped my bike at the bus stop and ran back to where he stood crying over his bad luck, surrounded by his friends-all of them pre-adolescents plying something or the other on that busy street. Gently tapping him on the shoulder, I asked him how much the umbrellas cost. 
'200 rupees each. But Saheb, all the umbrellas are soiled now. Nobody will buy them', he said in a small voice.
'I will. All of them.' 
'But why? They are useless now, saheb!'
'No, they are not!'
I took out a thousand rupee note from my wallet and tucked it quietly into his pocket. Taking all the five umbrellas from his tiny hands, I shook them open one by one and handed them to the boys. The last one I handed to the little boy, 'this one is for you'. A sudden burst of thick droplets washed away the mud from the umbrellas. And the gloom from the boy's face too. A dash of colors from the umbrella livened up his despondent face,'You are so kind sir, God has answered my prayers, I believe. Yesterday only I was burning with fever after getting drenched in the downpour and I prayed to God to help me and God came to me today.''
'No, I am human only. I just happen to like children. But where are your parents?'
'I don't know, saheb! Never saw them. None of us has any parents or home. We sell these things during the day and sleep here at the bus stop at night. I had borrowed money to buy these umbrellas from the uncle in that medicine store. I have to return his money in one week and that's why I was so worried and sad when all the umbrellas got soiled in mud.' he told me hesitantly.
'Have you eaten anything? And medicine?'
'Yes sir. The uncle from that medicine store gives us medicines whenever we fall ill. He is very kind, just like you. Sometimes he also teaches us in his free time.'
I ruffled his wet hair and asked his friends to take care of him. As I started walking towards my bike, he grabbed a yellow rose from the bunch in his friend's hands and offered it to me, 'Thank you, saheb. Aaj se aap aur hum dost?' he wiped his muddy hand on his dripping shirt and extended towards me. 
I took his hand, tapped it reassuringly but I didn't have the heart to tell him I was leaving the city the next day for an assignment.
'I will return in the evening, I made a silent promise to myself, 'and do whatever little I can do for them.'

Image credit: Pinterest.com/noradean1

Thursday, 26 May 2016

पाप मुक्ति वाया शुद्ध स्नान

मात्र ग्यारह रुपये में पाप मुक्ति? हैं! ये खबर सही है क्या भइया कि राजस्थान में एक मंदिर वाले वहां के सरोवर में स्नान करने के बाद पाप मुक्त हो जाने का सर्टिफिकेट दे देते हैं? वो भी सिर्फ ग्यारह रुपये ले कर?? 

वैसे आज ये चमत्कारी खबर सुनी तो एक बहुत पुरानी बात याद आ गयी, हमारे बचपन की है पर आज भी जब याद आती है तो हम सब भाई बहन अनायास ही हँस पड़ते हैं। हमारे घर के सामने, मने सड़क के उस पार एक परिवार रहता था, इलाहाबाद के पक्के ब्राह्मण थे। अंकल जी बिजली विभाग में इंजीनियर थे, सरकारी मकान, गाड़ी, नौकर-चाकर सब मिला हुआ था. फिर भी गांव देहात के तीन-चार लड़के हर टाइम उनके घर में पड़े ही रहते थे। चच्चा से सरकारी नौकरी की आशा में उनकी गइयों के बाड़े के बाहर ही डेरा डाले रहते और कभी गइया दुहते कभी कंडे थापते....हाँ भई, तीन-चार गौ माता भी पाली गयी थीं, आखिर चार-चार बच्चों के लिए शुद्ध दूध-दही-मक्खन का इंतजाम भी तो चाहिए, बाकी का बचा दूध पड़ोस के घरों में बिक जाता था. तो कुल मिला के आंटी जी के पास काम धाम बहुत था, चाहे आप खाना-कपड़ा=पोंछा नहीं कर रहे पर इतने सारे लोगों के काम का निरीक्षण करना भी तो एक काम ही है. अब चूँकि उनके बच्चे कुछ हम लोगों की उम्र के ही थे तो दोस्ती सी हो गयी थी. तो जब भी उनके घर जाओ तो नौकरों-लड़कों को फटकारते-डांटते हुए भी आंटीजी रोक ही लेती और कभी मिठाई तो कभी सेब-अंगूर परोस देती। शरमाते-ललचाते हम खा तो लेते पर फिर घर आकर अपनी मम्मी के गले पड़ जाते कि आप ये सब बढ़िया वाला फल-मिठाई काहे ना लाती हो, जब देखो वही घर के बगीचे के सूखे बेस्वाद अमरुद या बेर पकड़ा देती हो. मम्मी कुछ कहते-कहते एकदम से चुप हो जाती पर बाल-बुद्धि फिर भी सवाल पे सवाल दागे ही जाती, आप दोनों लोग कमाते हो, वहाँ तो सिर्फ अंकल जी कमाने वाले हैं, उनके घर में इतने सारे लोग हैं और हमारा परिवार तो इतना छोटा है फिर भी आप इतना कंजूसी काहे करते हो? उस वक़्त तो माँ हमें बहला-फुसला-डांट के चुप करा देती पर हमें तो अंकलजी के रोज-रोज आने वाले मेहमान दूर से भी दिख जाते थे. 
खैर, कुछ दिन बाद आंटीजी के घर से न्यौता आया रामायण जी के अखण्ड पाठ का, और उसके बाद भंडारे का. अफसर, दुकानदार, ठेकेदार....सभी सपरिवार न्यौते गए थे. आंटी अंकल जी के रिश्तेदार भी दूर दराज से पधारे। खूब धूमधाम से पाठ और भंडारा हुआ, करीब ६-७ सौ लोग तो जरूर रहे होंगे। फिर ये हर साल का कार्यक्रम हो गया, साल के आखिरी शनिवार रविवार को रामायण का अखण्ड पाठ और भंडारा! अब ये माजरा का है, हम सब बच्चे आपस में दिमाग लडियते रहते, कोई कहता काहे करते हैं ये सब हर साल? काहे इतना पइसा फ़ालतू उड़ाते रहते हैं? दूसरा बोलता कि हमरे हियाँ भी तो तीन-चार साल में अखण्ड पाठ होता है पर हमरे माई बापू तो भंडारा नाहीं कर पाते. कोई बच्चा कहता ये लोग बहुत पैसे वाला है तो कोई कहता हुह, दिखावा करते हैं ई लोग! मम्मी पापा या किसी उनके दोस्तों से पूछो तो भगा दिए जाते वहां से. फिर एक दिन हम आखिर सुन ही लिए बड़े लोगो की बातें, एक अंकलजी बोल रहे थे,''ये सब तो अपना पाप धोने के लिए करते हैं, साल भर खूब कंपनी वालों और ठेकेदारों को लूटते हैं और साल के आखिर में भगवान के नाम पर पूजा पाठ कर के सारे पाप धोने का कोशिश करते हैं ! ' 
अरे दद्दा रे! तो ये राज था आंटी जी के काजू किशमिश और सेब  अंगूर का......और हम अपने मम्मी पापा से ऐंवई ठिनकते रहते थे!
अब बताइए जरा, अगर पाप धोने का ये सस्ता तरीका पहले मालूम होता तो अंकलजी के कितने पैसे और मेहनत बच गए होते! वैसे पाप धोने के लिए मंदिरों में अंधाधुंध दान देने का उपाय सबसे अचूक नहीं है तो मंदिरों की आमदनी 27% तक बढ़ कैसे गयी है!
तो ये तो बड़ी मस्त खबर है यार! पहले क्यूँ ना बताया किसी ने? इसका तो टीवी, रेडियो, अखबार में धड़ाधड़ विज्ञापन होना चाहिए था। अब अपने सारे नेताओं, लुटेरों, चोरबाजारी वाले, सूदखोरों, किलर लोगों के लिए तो कितनी सुविधा हो जाती......चलो आज किसी को लूटो, धमकाओ, मार दो और कल जाके सरोवर में नहाओ, इस हाथ ग्यारह रुपये दो उस हाथ पाप मुक्ति का सर्टिफिकेट ले लो!  वैसे वो मंदिर वाले कहते हैं कि किसान लोग के खेती करते टाइम मिट्टी में कीड़े मकोड़े मर जाते हैं या फिर किसी के चलते फिरते पैरों के नीचे आ जाते हैं, मने गलती से पाप हो जाता है तब वो यहाँ आते हैं और पाप की भावना से मुक्ति के लिए स्नान करके शांत मन से घर लौट जाते हैं.......भाई, मेरे पास सर्टिफिकेट है, तुम्हारे पास क्या है! 
ओह वाओ......हाउ वेरी कनविनिएंट! पर भाई साहब अब ग्यारह रुपैय्ये में होता क्या है? महंगाई आसमान छू रही है, पंडितों ने भी घर बार चलाना है कि नहीं! चलो कोई ना...... ये सब दिलदार बन्दे हैं, खर्च करने में सकुचाएंगे ना.....अच्छा बोली लगाओ, जिसकी बोली सबसे बड़ी उसको सबसे पहले नहाने का और सर्टिफिकेट पाने का मौका मिलेगा. तो भाइयों बहनों, ग्यारह हज़ार एक, ग्यारह हज़ार दो....... 

#पापमुक्तिइनकलयुगटाइम्स 




Friday, 29 April 2016

कुछ साल पहले तक, मने अब आप ये मत पूछिएगा की कितने साल, बस हमारे बचपन की ही बात है.....गाँव -खेड़े-कसबे के लड़कों का मनपसंद टाइम पास होता था ढलती रात में चुपके से स्ट्रीट लाइट के पीली रौशनी वाले बल्ब तोडना। कभी इस मोहल्ले के कभी उस मोहल्ले के।  बस शर्त ये होती थी की कोई भी अपने गैंग के मोहल्ले के बल्ब नहीं तोड़ेगा। नए छोकरों को तो ख़ास हिदायत दी जाती थी...... देख बेटा, मेरा मोहल्ला और खास तौर पे मेरे घर के सामने के बल्बों से दूर ही रहियो। और जो किसी नामाकूल ने गुस्ताख़ी की तो उसके ऊपर तो मानो क़हर बरपा हो गया।
कुछ यही हाल आजकल के फेसबुकियों का है। भाई मेरी टाइम लाइन पे कोई गाली-गुफ्ता ना करियो, ज़रा तमीज से कमेंट लिखियो वरना......
हाँ भाई क्यों ना........गली गलौज का सारा हक़ तो तुम्हे ही है ना! मने तुम सारी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पे अश्लील, भद्दी भाषा में अपने विरोधियों को लताड़ते रहो तो ठीक है, उनके उलटे-सीधे मेम बना के जगह-जगह चिपकाते  रहो, पर जो कोई तुम्हारे दीवार पे कोई चित्रकारी कर दे, कुछ लिख-पढ़ दे तो तुम्हें तक़लीफ़ हो जाती है। उसे तुम फटाक से तड़ीपार यानि ब्लॉक कर दोगे।
क्यों?
क्योंकि तुम्हे अपना घर, अपनी दीवार, अपना मोहल्ला साफ़ सुथरा रखना है पर दूसरों के दरो-दीवार पे कालिख पोतने में तुम्हे कोई गुरेज़ ना है।
वाह रे स्वच्छ भारत प्रेमियों, साष्टांग प्रणाम है तुम्हें !

Wednesday, 9 March 2016

AAZADI

महिलाएं-पुरुष क्या चाहें?

महिलाएं क्या चाहें ?
आज़ादी!
'देवी माँ' बनने से आज़ादी,
'पैर की जूती' बनने से आज़ादी,
'खानदान की इज़्ज़त' का बोझ ढोने से आज़ादी,
सेल्फलेस, सेक्रिफिशिअल बनने की उम्मीदों से आज़ादी,
सिर्फ़ एक औरत, एक इंसान होने की आज़ादी,
'ना' कहने की मनाही से आज़ादी,
'दो टके की औरत' कहलाने से आज़ादी,
महिला दिवस के नाम पर डिस्काउंट ऑफर्स के आक्रमण से आज़ादी,
मेकअप की दो इंच मोटी परतों से आज़ादी,
फेयर एंड लवली होने से आज़ादी,
डार्क एंड अगली रहने की आज़ादी,
पतली होने के दबाव से आज़ादी,
ऑफिस में काम ना करने के आरोप से आज़ादी,
अपने आप को साबित करने के लिए घर-बाहर दुगना काम करने से आज़ादी,
फिर भी अच्छी माँ, बीवी, बहू, कर्मचारी ना बन पाने के गिल्ट से आज़ादी,

पुरुष क्या चाहें?
आज़ादी!
'बहादुर लड़के ' होने से आज़ादी,
'आदमी रोते नहीं' से आज़ादी,
'मर्द को दर्द नहीं होता' से आज़ादी,
रोज़ रोज़ शेव करने से आज़ादी, 
बर्थडे, एनिवर्सरी याद रखने की मजबूरी से आज़ादी,
बस, ट्रेन में महिलाओं के लिए सीट खाली करने से आज़ादी,
प्रोफ़ेशनल कॉलेजेस, नौकरियों में महिलाओं को प्राथमिकता से आज़ादी,
परिवार का मुख्य पोषक (ब्रेड विनर) होने से आज़ादी,
सिर्फ पैसा कमाने के बजाय अपना मनचाहा करने की आज़ादी,
गलती न होने पर भी महिला उत्पीड़क कहलाये जाने से आज़ादी,
मॉलेस्टेर, सेक्सिस्ट, मेल शॉवनिस्ट पिग कहलाये जाने के भय से आज़ादी,

महिलाएं पुरुष दोनों क्या चाहें?
धर्म-संस्कृति-सभ्यता के नाम पर सदियों पुराने नियमो-मान्यताओं को मानते रहने की मजबूरी से आज़ादी !
लैंगिक समानता के ज़माने में भी ज़बर्दस्ती थोपी जा रही बासी मानसिकता और सेल्फ-इम्पोज़्ड-इमेज से आज़ादी!





Saturday, 20 February 2016

KITNA KUCHH KAHNA BAAKI HAI

कितना कुछ कहना बाकी है
कितना कुछ सुनना बाकी है
गहरी ख़ामोशी इस पार भी है
कुछ ग़मगीन सा शोर उस पार भी है
कुछ चुभते सवालों की भीड़ इस ओर से है
कुछ कड़वे जवाबों की भरमार  उस ओर से है
गहराता अँधियारा उस ओर भी है
कुछ चौंधियाती सी रौशनी इस ओर भी है
सुकूँ की दो साँसे ना उस तरफ हैं
चैन की नींद ना इस तरफ को है

नाउम्मीदी का आलम हर ओर है
इक अजीब सी बेचैनी फ़िज़ा में ठहरी है
मुस्कुराहटों में तीखी तलवार सी धार भी है
शहद से मीठे लफ़्ज़ों में लिपटा एक पैना वार भी है
किस किस पर शक़ ना करें,
पीछे हर मेल-मुलाकात के भी
छुपता यूँ विश्वास का घात ही है
हर मदद को उठते हाथ में भी
आती महक ख़ूनी नरसंहार की है।



   

Thursday, 4 February 2016

Women, National Economy And #GiveItUp

So they say women do not have much awareness of national economy, they can not be bothered about how people are suffering due to lack of employment opportunities, how poor people manage their lives without enough money, food, clothes etc.
I bet I can prove all of them morons wrong, and that too within a few minutes!
We do know all about national economy and its intricacies. And we know that the prospects of our nation's dwindling economy depend on us women only.
Now our PM has inspired so many Indians with his #GiveItUp campaign and since we don't believe in a monopoly market, hence we have gladly 'given up' our monopoly over house work. We hire house helps for cleaning, washing, cooking and have successfully created lakhs of jobs for the poor and the needy. Now we either get food made by our cooks at home, get home delivered or go out to a restaurant ourselves, we also buy all our wafers, papads, pickles, sauces, cakes and sweets etc from the market thus creating a huge #DemandSupply market for the food and packaging industry. We have started even hiring event managers to organize our parties and functions in restaurants, hotels, banquet halls and farm houses instead of our own homes.
Earlier we would do our designing, stitching and embroidery ourselves but then we realized that we were depriving many skilled and talented men and women of their rightful work and earning, so we stopped ourselves from doing that also and outsource everything to boutiques and designers now. Every few months we 'give away' even our sparingly worn clothes to poor people. What if we have to go and buy more dresses for us....... we are so kind and helpful people, you know!
Our grandmas depended on homemade ubtans (face/body scrubs and packs) but you can't really trust their effect on our delicate skins, can we? Besides that, wouldn't all the cosmetic products companies, beauty parlors and spas have to shut shop if we continued doing all our beauty treatments at home, ourselves? And how about the beauty consultants who provide all the beauty packages within the clean and hygienic environments of our own homes? We have to take care of their roji-roti too, after all!
And so many of us insist on buying only imported stuff to balance the import-export ratio too.
Now when we do so much of introspection, intense discussions and debates about issues pertaining to national economy during our social work sessions, kitty parties, ladies club meetings and get togethers, it is bound to affect our health too. Then we need to join gyms and hire workout trainers to get back into shape. It's just give and take yaar....you lose some stubborn weight and gain back your beauty and health by some spending money but what is the value of a few thousand bucks if it helps fill the pockets of some poor gym wale bhaiyas......
Now we are so conscientious and caring people that we have purposefully stopped helping our kids with their studies because we want to fulfill our social responsibility towards our educated unemployed too. So we now rely on only home tutors, coaching classes and personal coaches and trainers for our kids' education.
A little sacrifice here and a little sacrifice there on our part can really set the nation's struggling economy back on track, you see!
Do we mind it? Naah....nation first, always!




Wednesday, 3 February 2016

Intolerance For Intolerance

There is much brouhaha about intolerance in social, political and religious circles these days but how about intolerance in personal relationships?
Children-parents, husband-wife, in-laws, siblings, friends, students-teacher, workers-employer......is there any tolerance left anywhere?
You say something but you can not be sure how it is going to be construed by the other person. Nobody wants to stay a second and listen to the other person patiently, objectively. Listening, a vital component of any meaningful and fruitful conversation and discourse, has become a rare commodity. Poor listening skills compound the problems in relationships as they lead to people judging each other by what they say, not by what they mean.
They say every action has a reaction to it. These days people have instant desires and then desire for an instant fulfillment as well. Be it that wow dress, the cool clutch, a diamond dangler, the latest bratty bike, a selfie with the hottest heartthrob in college, and hundreds of 'likes' on scores of selfies posted everyday. But if the desired object or outcome is not achieved for any reason, then God save everyone nearby!
If the parents refuse permission for a late night party/movie, if the child demands that Xbox you promised for scoring 90%, if the wife reminds about the long overdue cleaning up, if the husband asks for another cup of coffee, if the sibling fails to call up the other twice a week......then all the intolerants simply be damned!

Tuesday, 26 January 2016

डिश के रंग निराले
शहर के अंदर कोई झोपड़पट्टी हो या शहर से दूर कहीं कोई गाँव, अधकच्चे अधपक्के दोमंजिले घर हो या टूटी फूटी खपरैल वाली झोपड़ियां, छतों के ऊपर कुकुरमुत्ते सी एक डंडे पे उगी केबल टी वी की डिश अनिवार्य हो चुकी है. और हो भी क्यों ना? गरीब की नीरस बेरंग ज़िंदगी में रस और रंग  भरने की ज़िम्मेदारी अब टी वी के हवाले हो चुकी है. क्या वो कजरी क्या वो आल्हा, क्या वो कुश्ती क्या वो कबड्डी, अब तो सारे तीज त्यौहार इस गोल तश्तरी के संग साथ के बिना अधूरे से लगते हैं. चुन्नू की अम्मा, रानी की दादी, गुल्लन का भाई, कबीर के अब्बा, शीला की बेटी और जुम्मन का लड़का........ सभी के सपने अब इस आकाश से उतरी उडनतश्तरी की मेहरबानी से ही अवतरित हो पाते हैं. कच्ची लकड़ी के फट्टे और प्लास्टिक की गेंद से खेलने की पीड़ा स्टेडियम में सफ़ेद चमचमाती ड्रेस में सचमुच के बैट बॉल से खेलते क्रिकेटरों को देख कर कुछ और टीसने लगती है पर एक बटन दाबते ही होटल में नाचते गाते हीरो हीरोइन को देखते ही हर जवान होते छोरा छोरी के मन में भी कुछ अनूठे अरमान फिर करवट लेने लगते हैं. गरीब की ज़िंदगी की सूनी थाली में कुछ नए स्वाद भर देने का ज़रिया है ये डिश!

Monday, 25 January 2016

SAWAAL

नए सवाल
क्यों करते हो इतने सवाल?
आड़े तिरछे, उलटे-सीधे, लम्बे-छोटे सवाल. 
क्यों जान कर भी बन रहे हो अनजान, 
क्या दीखते नहीं खिलते उजियारे के निशान?
विदेशी व्यापार हो या देशी बाजार,
मुद्रा बैंक हो या स्टार्ट अप इंडिया का प्रचार,
नज़रें  उठा कर देखो तो अपने आस पास, 
चँहु ओर हो रहा है सर्वोन्मुखी विकास,

नयी ऊर्जा से खनक रहा है स्वच्छ भारत
बहु शीघ्र फैलेंगें चमकीले रंग चटक, 
गरीबी-अशिक्षा का कलंक हो या 
कन्या भ्रूण हत्या की परंपरा विकट, 
सड़कों पे बदबूदार कचरे के ढेर हों 
या दफ्तर में धूल फांकती फाइलों के,
भ्रष्टाचार हो या आतंकवाद विकराल,
सरपट बदल रही है देश की चाल. 
फिर क्यों हो रहा है देश में हर दिन 
धर्म-अधर्म, सहिष्णुता-असहिष्णुता का नया बवाल? 

स्वतंत्रता के सात दशकों बाद भी 
क्यों था देश का हाल ऐसा बदहाल फटेहाल, 
हैरत है क्यों नहीं पूछा किसी ने 
आज तक किसी सरकार से कोई सवाल?