Thursday, 8 October 2015

पारिजात

वो मोहल्ले का चौराहा, रात का आखिरी प्रहर,
विरही पपीहे की पुकार, और तुम्हारी प्रणयी नज़र,
तुम्हारा मेरी गली के चक्कर लगाना बार बार,
वो खुशबू से रचे तुम्हारे खत,
और तोहफे, कस्मे-वादे बेहिसाब,
वो मीठी मधुमालती और मदहोश कर देता देसी पारिजात,
फिर जाने कैसे कब, कुछ होश ना रहा तुम्हें और क्यों कर,
तुम्हें भाने लगे बेख़ुश्बू विदेशी गुलाब और ऑरकिड आभिजात. 
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