Monday, 21 September 2015

हिंदी-हमारी मातृभाषा 

अभी कुछ चंद दिनों पहले ही हम ने हिंदी दिवस और हिंदी सप्ताह मनाया है. लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं की हिंदी दिवस साल में एक बार आने वाले त्यौहार की तरह मनाने की ज़रुरत ही क्यों आन पड़ी? क्यों हिंदी को सिर्फ एक दशहरा-दीवाली, शादी-विवाह में पहने जाने वाले भारतीय परिधान की तरह का दोयम दर्ज़ा दे कर अपने कर्तव्य की पूर्ती समझ ली जाती है?
आज से कुछ साल पहले मैं दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में नौवीं-दसवीं कक्षा के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती थी। कुछ सात-आठ साल पहले स्कूल के वार्षिक अभिभावक
ओरिएंटेशन प्रोग्राम का मैं सञ्चालन कर रही थी और अभिभावकों के प्रश्नो-सुझावों का उत्तर प्रिंसिपल और अकादमिक कोऑर्डिनेटर दे रही थीं। लगभग सारा कार्यक्रम, सारी बातचीत अंग्रेजी में ही हो रही थी। पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले एक बच्चे के पिता जो दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में प्रोफेसर भी थे, उन्होंने अचानक एक सवाल पूछ कर प्रिंसिपल और कोऑर्डिनेटर को पशोपेश में डाल दिया. उन्होंने पूछा की क्यों हम अध्यापक-अध्यापिकाएं शिक्षार्थियों पर स्कूल में सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करने का दबाव डालते हैं? क्यों हिंदी में बात करने या उत्तर देने पर फाइन देना पड़ता है ?
सवाल जायज़ था और  जवाब मुश्किल.
मैं ने आगे बढ़ कर कोऑर्डिनेटर को इशारा किया की उनके सवाल का जवाब मैं देना चाहूंगी। माइक हाथ में ले कर मैं ने पहले हिंदी में ही अपना परिचय प्रोफेसर साहेब को दिया। मैं ने उन्हें कहा की अंग्रेजी की अध्यापिका होने के बावजूद मेरी नज़र में अपनी मातृभाषा का स्थान किसी भी अन्य भाषा से ऊपर है। मैं हमेशा अपने विद्यार्थियों को हिंदी व्याकरण, शब्दावली, गद्य और पद्य पढ़ना, लिखना, बोलना सीखने के लिए उत्साहित करती हूँ और स्कूल अधिकारियों का भी यही मानना है की कोई अन्य भाषा सीखने से पहले बच्चों का अपनी मातृभाषा पर अधिकार होना ज़रूरी है. हम कभी भी हिंदी की कीमत पर अंग्रेजी को बढ़ावा नहीं देते. परन्तु आजकल के प्रतियोगितात्मक परिवेश में अंग्रेजी पर भी बराबर अधिकार होना अत्यधिक आवश्यक है. यही कारण है की स्कूल अधिकारी और अध्यापिकाएं अंग्रेजी ज्ञान पर भी बराबर ज़ोर देते हैं। मेरे इस जवाब को सुन कर अन्य लोगों के साथ साथ प्रोफेसर साहेब भी पूरी तरह संतुष्ट दिखाई दिए।
आज भी मेरा विश्वास यही है की हम सब को अपनी मातृभाषा का समुचित ज्ञान होना ही चाहिए। हिंदी को भले ही आज भी राष्ट्र भाषा का स्थान ना प्राप्त हो परन्तु भारत की एक बहुत बड़ी जनसँख्या हिंदी और उस से मिलती जुलती अन्य भाषाएँ और बोलियाँ अपनी प्रथम भाषा के रूप में लिखती पढ़ती बोलती है. तो फिर हिंदी सीखने में क्या बुराई है?

यदि माँ बाप हमारे पहले रिश्तेदार और गुरु हैं तो मातृभाषा हमारी पहली सखा-सहेली है जिसका हाथ पकड़ कर हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं, मस्ती मज़ा करते हैं, रोते गाते हैं, लड़ते झगड़ते गुस्सा करते हैं और इसी के भरोसे ज़िंदगी के आड़े-तिरछे रास्तों को पार करते हैं। यदि ये साथी कहीं फिसला तो समझो आप खुद फिसले!
और फिर क्या आप एक विदेशी भाषा को अपनाने के लिए अपने सबसे पहले पक्के वाले मित्र का त्याग कर सकते हैं?