Thursday, 30 April 2015

Flame Of The Forest

                                          Pic courtesy:imgkid.com

Flame Of The Forest

Long winding metalled roads, merging at a cross
Deserted, black as a clean black slate,
Away from the sophisticated, urban, maniacal chaos
The lone traveler's steps lose their spate,

Stand still the boundless, bare trunks of autumn trees
Echoing the desolation of a forlorn heart,
Deceived, deprived, overwhelmed with a conceited noise
When a solitary yellowing leaf offers an enticing bait,
Beckon him strings of sunny yellow Laburnum blooms
Flames his wan affections-the red Flame of the Forest,
A sudden wild cry of a lovelorn bird breaks the stillness
The warbler fluffs his wings, breaks into a swift flight,
Setting in motion the stalled engine of suppressed desires
A mysterious chord strings music in a life bereft,
To his aimless life, his choice will make all the difference
The traveler moves on-his steps firm and resolute.

Wednesday, 29 April 2015

लव इन ऑटोरिक्शा टाइम्स

हे रिक्शावाले, राजपुर रोड चलोगे?
बैठिये मैडम।
आप जॉब करते है क्या मैडम? पर आप यहाँ की तो नहीं लगती।
हाँ. मैं दिल्ली की नहीं हूँ. यहाँ न्यूज़पेपर में रिपोर्टर का काम करती हूँ।
मैं भी किसी को जानता हूँ जो हमेशा रिपोर्टर बनना चाहती थी.
अच्छा! कौन, कहाँ?

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी,
नज़र के सामने घटा सी छा गयी....

ऍफ़ ऍम पे बजते गाने के सुरों के साथ कुछ पुरानी यादें भी उमड़ आईं।

रुद्रपुर में, मैडम। रजनी, हमारी दूर की भाभी की बहिन थी. हम गए थे बरात में, वहीं मिली थी. वो तब सत्रह साल की थी और हम बीस के।
रुद्रपुर? रजनी?
हाँ मैडम। यूँ ही फेरों की अग्नि की लाल-पीली-नारंगी रौशनी में हमने भी कुछ सतरंगे सपने देखे थे।
फ़िर ?
फिर क्या मैडम? हम ठहरे अनाथ जिसका आगे नाथ ना पीछे पगहा, पढाई पूरी हुई ना थी और पैसे-लत्ते का ज्यादा कोई जुगाड़ था नही. सो भइया ने जब शादी की बात करी तो हर तरफ़ से ना ही सुनने को मिली। दिल पे झटका लगा तो फिर हम भी चले आये शहर.
और ये ऑटो?
यहाँ आकर हमने पहले अपनी ग्रेजुएशन पूरी करी और अब इग्नू से एम बी ए कर रहे हैं. ये ऑटो तो हम पार्ट टाइम चलाते हैं, फ़ीस और खर्चे पानी के लिए.
पर तुमने उस लड़की से उसकी मर्ज़ी कभी नहीं पूछी? कभी पलट कर वापस नहीं गए?मैडम, हमारी तरफ़ की लड़कियों की ज़ुबान ही ना होती तो उनकी मर्ज़ी कौन पूछने देता? पर जैसे ही हमें एक अच्छी नौकरी मिल जायेगी, हम जाएंगे जरूर !
और तब तक अग़र उसकी शादी हो गयी तो?
नहीं मैडम, अपनी क़िस्मत इतनी भी ख़राब नहीं हो सकती. वो हमें मिलेगी ज़रूर. लीजिये, आपकी मंज़िल आ गयी.
और तुम्हारी मंज़िल, विनय?
मेरी मन्ज़िल....विनय....आपको मेरा नाम कैसे मालूम?

क्यों पहचाना नहीं अपनी रिपोर्टर रजनी को, इतना ही भरोसा था अपने प्यार पे?

और आप सभी प्यार करने वालों के लिए हाज़िर है एक और टाइमलैस क्लासिक.… आर जे नितिन की ओर से.….

कबके बिछड़े हुए हम आज कहाँ आ के मिले,
जैसे सावन से कभी प्यासी घटा छा के मिले....



Wednesday, 15 April 2015

तुम कब लौटोगे? 

अब तो फ़रवरी के कुहसाये दिन और सर्द रातें भी इतिहास हो गयीं. मार्च में छितराये होली के रंग भी फीके पड़ चुके. . बच्चों की परीक्षाओं के परिणाम आ चुके, नए साल की पढाई भी शुरू हो गयी. बजट सेशन ख़त्म हो गया, लैंड एक्वीजीशन बिल पे झगड़ा-धरना-प्रदर्शन भी हो चुके और प्रधान मंत्री अपना भारत प्रवास समाप्त कर वापस यूरोप जा चुके. पर तुम ना कहीं दिखे. लोगों के चेहरे से मुस्कान गायब है, मायूसी अपने पैर चारो ओर पसार रही है. कुछ दूरदर्शी खोजी आँखें भी तुम्हारे ठौर ठिकाने ना जान पा रहीं सो अब तो ना टी वी देखने में, ना अख़बार पढ़ने में वो मज़ा है. यूँ अपने चाहनेवालों को धोखा दे कर तुम अचानक कहाँ चले गए? यहाँ तक कि तुम्हारे वियोग से व्याकुल आकाश में बादल मचल मचल कर आँसू बरसा रहे हैं, पेड़ों पे नई कोपलें तुम्हें देखने को बेक़रार हो रही हैं और लू ने अपने रंग दिखाने से मना कर दिया है. विरह पीड़ा से त्रस्त इंटरनेट योद्धाओं की चुटकुलों की दुकान बंद होने की नौबत आ गयी है.
आखिर तुम कहाँ हो, कब लौटोगे?
अब तो लौट आओ, राहुल!

Monday, 13 April 2015

नक़ल की अक़ल या अक़ल की नक़ल 

देखो जी, इसमें बहस की कोई गुंजाइश तो है नहीं कि आउटसोर्सिंग के किंग तो हम इंडियंस ही हैं!पहले हमारे टीचरों ने अपनी टीचिंग जॉब दूसरे टीचर्स को आउटसोर्स की, ऑफ़ कोर्स थोड़े से कमीशन के बदले! फ़िर स्टूडेंट्स ने अपने गुरुओं के पद चिन्हों पे चलते हुए अपने असाइनमेंट्स/प्रोजेक्ट्स आउटसोर्स किये कुछ स्पेशलिस्ट्स को। और फिर उनके माँ-बाप ने बच्चों के एग्जाम में हेल्प आउटसोर्स की कुछ भाई लोगों को.…आख़िर बेरोज़गारों की रोज़ी रोटी भी तो चलनी चाहिए ना! अब भइया जी, नया ज़माना है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि गुरु गुड रह जाए और चेले शक्कर हो जाएँ .... तो अब टीचर्स ने भी अपनी बोर्ड एग्जाम ड्यूटी यानी कॉपी चैकिंग की ड्यूटी भी आउटसोर्स कर दी है.... क्या हुआ जो बारहवीं के एग्जाम पेपर्स चेक करने वाले स्कूल के चपरासी और क्लर्क हैं.…या फ़िर इंग्लिश की कॉपी संस्कृत वाले और हिंदी वाले टीचर मैथ्स की कॉपी चेक कर रहे हैं, टीचर तो भगवन का रूप होते हैं, बच्चों के साथ नाइंसाफी थोड़े ना करेंगें! 

#IndianEducationSystem

Sunday, 5 April 2015

Fair And Lovely

फेयर एंड लवली

वो थी एक ख़ूबसूरत लड़की
फेयर एंड लवली सी,
भोली-भाली और कुछ शरमाई सी,
संजोये थे जिसने चंद सपने बचपन से,
सब की तरह कुछ बनने-बनाने के,
कुछ ट्रॉफी और कप जीत के लाने के,
और वाक़ई सच हुए उसके सपने सारे,
कप भी मिले,
सोलह साल की बाली उम्र में
शादी के बाद कप भी मिले ढेर सारे,
और मिले धोने को प्लेट्स-ग्लास-चम्मच-कटोरे,
तवा, चकला-बेलन, कढ़ाई-कुकर,
पंद्रह सदस्यों के परिवार के लिए
चार वक़्त चाय-खाना-नाश्ते बनाने खिलाने में,
सचमुच सच हुए कुछ बनने के सपने,
बीस साल की नन्ही ज़िंदगी में
तीन नन्हे-मुन्नों की माँ बन के.
फेयर एंड लवली, भोली-भाली, शरमाई सी एक लड़की,
अब अनफेयर-अगली, स्क्रीमिंग-शाउटिंग चिड़चिड़ी माई!
एक और छोटी सी प्रेम कथा 

हाँ हाँ मुझे याद है मैंने वादा किया था. मुझे पता है ये ग़लत है.
मैं जानता हूं ऐसा करना सख़्त मना है पर क्या करूँ कंट्रोल नहीं होता!
नहीं, अब और नहीं, पहले ही बहुत ज्यादा हो चुका है, अब कल के लिए भी कुछ छोड़ दे बेवक़ूफ़.
सिर्फ़ एक, खा लेता हूँ सिर्फ एक काजू कतली और! क्योंकि ये दिल है कि मानता नहीं!

लव इन मिठाई टाइम्स


Thursday, 2 April 2015

Siddhi

LONELY GIRL IN THE CITY
Siddhi
She got up, dusted her clothes and picked up her pooja thali from the road. 
It was the last day of Navratri and Siddhi had gone to the temple to pay her obeisance to her guardian-angel, Goddess Durga. She had moved to this city only recently for a new assignment. Her parents had been a bit wary and advised her to be careful while moving around in a new city.
The temple had a long queue of devotees and it had taken her longer than she had planned for. Rushing towards the parking in the nearby office complex, she called up her assistant to keep the documents ready for her perusal and also to reschedule her evening meeting with a new client.
A press on the remote unlocked the car doors. Just as she was nearing the car, she heard a faint cry. She looked around the few vehicles parked there but saw nobody anywhere in the desolate parking, closed as the offices were on the weekend. Shrugging off the sound as her delusion she opened the rear door to keep her pooja thali.
Then she heard it again. A muffled call 'someone help' alerted her. With tentative steps, she moved towards the nearest car-a black SUV parked a few meters away. Just then a hand banged on the window glass from inside the monster vehicle. Siddhi flipped open her cell phone and dialled 100 with trembling hands. And spoke in a clear firm authoritative voice.
Then the door opened and a young girl fell out. A burly middle aged man jumped out and pounced on her. The disheveled state of the girl and her perpetrator left no doubt in Siddhi's mind about her next move.
A brass pooja thali hit the oppressor on the head as he bent down to pick up his terrified victim. A fistful of vermilion blinded him and a sharp war cry deafened his ears.....he doubled up with pain from the mighty booted kick in his shins. Sidhhi dragged the semiconscious girl to her feet and dealt a powerful blow in the pervert's groin to finally knock him out.
Both girls spat at him. And smiled faintly. The siren from the police van could be heard closeby.
Chants from the temple floated in the wind......
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

Wednesday, 1 April 2015

दुनिया के बीस सबसे दूषित शहरो में है
दिल्ली-हमारा शहर, हमारी राजधानी,
ताउम्र अपना पैदायशी हक़ समझा जिसे,
आज महंगे दामों बिकता है वही हवा और पानी।
लव ऐट लाल बत्ती
कल तू आ रही है ना?
कहाँ, वहीं मेट्रो स्टेशन पे?
नहीं रे, कल तो मंडे है, वहाँ बहुत भीड़ होगी। हुमांयू के मक़बरे पे चलते हैं.
नहीं नहीं, मक़बरे में नहीं!
क्यों? वहाँ तो इतनी हरियाली है और कोई भीड़ भी नहीं होगी।
इसीलिये तो!
क्या मतलब?
शहर की भीड़-भाड़ में धक्के खाते हुए, गाड़ियों का धुँआ फांकते हुए भी एक-दूसरे की धुंधलाई आँखों में खो जाने का सुख हरे-भरे बाग़ की ठंडी हवा में कहाँ!
सही कहा तूने. पेड़ों के चक्कर लगाते हुए गाना गाने की तो ना उम्र रही ना इच्छा। अब तो चाँद तारो की जगह ये ट्रैफिक लाइट की टिमटिमाहट ही ज्यादा मनभाती है.
याद है, यहीं इसी चौराहे पे बीस साल पहले तू मिला था और यहीं लाल बत्ती पे कभी खिलोने तो कभी दिल वाले गुब्बारे बेचते हुए कितनी गाड़ियों के चक्कर काटे हमने। होरन की पीं पीं के शोर में ही दिल की कितनी बातें बाँटी थी।
और इसी गोल चक्कर के चक्कर लगाते लगाते हम भले ही बूढ़े हो चले, पाँव भले ही डगमगाने लगे हैं पर हमारा प्यार आज भी ढला नहीं है.
हाँ रे, यहाँ थमने वाली गाड़ियाँ भले ही आठ फुट से सोलह फुट हो गयी पर गाडीवालों के दिल उतने ही छोटे हैं. बंद शीशों के अंदर से उन्हें हम गरीबों के रिश्ते भी बिन्नेस ही नजर आते हैं.
चल छोड़, अपने इसी प्यार के नाम पे अपनी डेट फिक्स, कल फिर से यहीं इसी लाल बत्ती पे, लिट्टी चोखा और छाछ के साथ! .
धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले..........सुन ना ले कोई सुन ना ले।