Tuesday, 22 December 2015

वो  सोनीपत की छोरी,  और वो इन्दिरापुरम का गोरा......दोनों की नज़रें मिली थी एक सर्द शाम के गहराते अंधियारे में पुरानी दिल्ली के एक पुराने बस स्टॉप पे. बस की इंतज़ार में छोरी थी कुछ घबराई सी, लड़का कुछ उकताया सा.
अचानक लड़की ने अपना उजियाला सा शॉल उतार कर दूर फेंका और चिल्लाई, 'उफ़ ये क्या है!बचाओ बचाओ!' पहले तो लड़का कुछ घबराया, 'मैं ने तो कुछ नहीं किया, लड़की और उसके अलावा और कोई वहाँ था नहीं, फिर ये क्यों चिल्लाई?' वो कुछ ठिठका, कुछ ठहरा, फिर हिम्मत जुटा कर दौड़ा लड़की की मदद करने। 
'एक नामाकूल कॉकरोच की ये मज़ाल की आप की शान में गुस्ताख़ी करे'.....लड़के ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए एक हल्का वाला जोक मारा। 
अगले आठ-दस महीनों में कुछ हलके कुछ भारी, कुछ मीठे कुछ खट्टे हंसी-मज़ाक, रूठना मनाना चलता रहा. मेट्रो स्टेशन, शॉपिंग मॉल, स्टेडियम की अधखुली-अनजानी सीढ़ियाँ बहुत जल्द उनकी मुलाकातों की गवाह बन गयी. मूलचंद के परांठे, सरोजिनी नगर की शॉपिंग, के-नैग्स के तंदूरी मोमोज़, आई टी ओ वाले अंकल की चाय और उनकी लिखी किताबें, लाजपतनगर का बंटे वाला लेमन-सोडा और चाइनीज़ चाट (!), यूपीएससी की भारी भरकम बेस्वाद भल्ला पापड़ी.........उनकी गप्पों में अनूठे स्वाद यहीं से मिलते रहे. हुमायूँ का मक़बरा, निजामुद्दीन के पार्क, सुन्दर नगर की नर्सरी, तुगलकाबाद फोर्ट, संजय लेक.........कोई ऐसी जगह ना बची थी जिसकी मिट्टी पे उनके क़दमों के निशाँ ना छूटे हों, कोई ऐसा फ़िज़ा ना थी जहाँ उनकी मीठी मुस्कुराहटों की खुशबू ना फैली हो, कोई ऐसा कोना ना था जहाँ उनकी हंसी ना गूंजती हो. 
फिर एक दिन........ वो आ गया!
वो! 
जिसके आने पे पार्क, शॉपिंग मॉल, सिनेमा, रेस्तरॉं, पब सुनसान पड़ जाते हैं, वो जिसके आने पे होठों की मुस्कुराहटें गायब हो जाती हैं, वो जिसके नाम से ही बच्चे, माँ-बाप सब खौफ में आ जाते हैं!

वो यानि कॉलेज के एनुअल एक्साम्स!

और फिर?....... फिर क्या!
फिर बस फ़ोन का बिल आसमान पे!!






Saturday, 5 December 2015

विकास तो होना ही चाहिए!

क्योकि बढ़ रही है पॉपुलेशन,
पर वो कहते हैं विकास हो कहाँ रहा है?
तो इसीलिए हर ओर हड़ताल, हर जगह अनशन,
हर गली, हर डगर, हर शहर,
बढ़ती जा रही है भूख,
बढ़ती जा रही है विकास की प्यास,
अरे जनाब, हो तो रहा है विकास,
हर गली, हर डगर, हर शहर,

पर ये कैसा है विकास?

नदियों, झीलो, तालाबों को पाट कर बना दी ज़मीन,
और ज़मीन की जगह दोमंज़िले तक चढ़ आया पानी,
जंगल, हरियाली की जगह कुकुरमुत्ते से उग आये हैं
गगनचुम्बी इमारतें, फैक्ट्रियां, शॉपिंग मॉल,
धूल-धुंए से जनता-जानवर हुए बेहाल,
कही बेहिसाब गिरती तूफानी बारिश,
तो कहीं पड़ता सूखा और अकाल,
फिक्र की बात ये की इस परेशानी में भी कुछ हो गए मालामाल!

अरे तो क्या हुआ भाई साहब, किसी का भी हो, हो तो रहा है विकास!

Wednesday, 25 November 2015

फूल इक गुलाब का,
बेशक नन्हा सा, छोटू सा,
पर अपने तीखे नुकीले कंटीले सिंहासन पे
अभिमानी शहंशाह सा बैठा,
फिर भी अपनी मखमली गुलाबी पत्तियों में
कितनी मीठी खुशबू समेटे,
बिलकुल ज़िन्दगी की तरह
कुछ-कुछ मीठी, कुछ-कुछ कड़वी,
कुछ-कुछ दिन-रात की तरह
कभी सुनहरा दिन, कभी गहराता अँधियारा
कभी काले बादल तो कभी रुपहली चांदनी।
क्या मायूस हो जाएँ कुछ नए उगते काँटों से, 
अंधियारे से, घने काले बादलों से,
या मुस्कुराते रहें मदमस्त हो कर
इसकी मनमोहिनी खूबसूरती और खुशबू से?

Wednesday, 4 November 2015

अबकी बार बिहार में किसकी सरकार?

अबकी बार, जनता करे बस एक गुहार,
भड़काऊ भाषण, विज्ञापन, झूठा प्रचार, 
अब ये सब गाली-गलौज, नौटंकी बंद कर दे यार,
क्या है जनता की इच्छा, कर ले ज़रा विचार,
आज चाहिए सिर्फ सुरक्षा, शिक्षा, भोजन भरपूर, 
स्वास्थ्य, पक्का मकान, नौकरी और व्यापार,
जाती, धर्म, गाय, भैंस, बकरी के नाम पर 
ना आपस में लड़वाओ, ना बनाओ उल्लू बार बार,

अदरवाइज़ इवेन आई डोंट केयर हू यू आर 
जस्ट शट अप एंड गेट लॉस्ट फ्रॉम हियर!


Thursday, 8 October 2015

पारिजात

वो मोहल्ले का चौराहा, रात का आखिरी प्रहर,
विरही पपीहे की पुकार, और तुम्हारी प्रणयी नज़र,
तुम्हारा मेरी गली के चक्कर लगाना बार बार,
वो खुशबू से रचे तुम्हारे खत,
और तोहफे, कस्मे-वादे बेहिसाब,
वो मीठी मधुमालती और मदहोश कर देता देसी पारिजात,
फिर जाने कैसे कब, कुछ होश ना रहा तुम्हें और क्यों कर,
तुम्हें भाने लगे बेख़ुश्बू विदेशी गुलाब और ऑरकिड आभिजात. 
Pic Moods:Geeks and Freaks

Monday, 21 September 2015

हिंदी-हमारी मातृभाषा 

अभी कुछ चंद दिनों पहले ही हम ने हिंदी दिवस और हिंदी सप्ताह मनाया है. लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं की हिंदी दिवस साल में एक बार आने वाले त्यौहार की तरह मनाने की ज़रुरत ही क्यों आन पड़ी? क्यों हिंदी को सिर्फ एक दशहरा-दीवाली, शादी-विवाह में पहने जाने वाले भारतीय परिधान की तरह का दोयम दर्ज़ा दे कर अपने कर्तव्य की पूर्ती समझ ली जाती है?
आज से कुछ साल पहले मैं दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में नौवीं-दसवीं कक्षा के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती थी। कुछ सात-आठ साल पहले स्कूल के वार्षिक अभिभावक
ओरिएंटेशन प्रोग्राम का मैं सञ्चालन कर रही थी और अभिभावकों के प्रश्नो-सुझावों का उत्तर प्रिंसिपल और अकादमिक कोऑर्डिनेटर दे रही थीं। लगभग सारा कार्यक्रम, सारी बातचीत अंग्रेजी में ही हो रही थी। पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले एक बच्चे के पिता जो दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में प्रोफेसर भी थे, उन्होंने अचानक एक सवाल पूछ कर प्रिंसिपल और कोऑर्डिनेटर को पशोपेश में डाल दिया. उन्होंने पूछा की क्यों हम अध्यापक-अध्यापिकाएं शिक्षार्थियों पर स्कूल में सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करने का दबाव डालते हैं? क्यों हिंदी में बात करने या उत्तर देने पर फाइन देना पड़ता है ?
सवाल जायज़ था और  जवाब मुश्किल.
मैं ने आगे बढ़ कर कोऑर्डिनेटर को इशारा किया की उनके सवाल का जवाब मैं देना चाहूंगी। माइक हाथ में ले कर मैं ने पहले हिंदी में ही अपना परिचय प्रोफेसर साहेब को दिया। मैं ने उन्हें कहा की अंग्रेजी की अध्यापिका होने के बावजूद मेरी नज़र में अपनी मातृभाषा का स्थान किसी भी अन्य भाषा से ऊपर है। मैं हमेशा अपने विद्यार्थियों को हिंदी व्याकरण, शब्दावली, गद्य और पद्य पढ़ना, लिखना, बोलना सीखने के लिए उत्साहित करती हूँ और स्कूल अधिकारियों का भी यही मानना है की कोई अन्य भाषा सीखने से पहले बच्चों का अपनी मातृभाषा पर अधिकार होना ज़रूरी है. हम कभी भी हिंदी की कीमत पर अंग्रेजी को बढ़ावा नहीं देते. परन्तु आजकल के प्रतियोगितात्मक परिवेश में अंग्रेजी पर भी बराबर अधिकार होना अत्यधिक आवश्यक है. यही कारण है की स्कूल अधिकारी और अध्यापिकाएं अंग्रेजी ज्ञान पर भी बराबर ज़ोर देते हैं। मेरे इस जवाब को सुन कर अन्य लोगों के साथ साथ प्रोफेसर साहेब भी पूरी तरह संतुष्ट दिखाई दिए।
आज भी मेरा विश्वास यही है की हम सब को अपनी मातृभाषा का समुचित ज्ञान होना ही चाहिए। हिंदी को भले ही आज भी राष्ट्र भाषा का स्थान ना प्राप्त हो परन्तु भारत की एक बहुत बड़ी जनसँख्या हिंदी और उस से मिलती जुलती अन्य भाषाएँ और बोलियाँ अपनी प्रथम भाषा के रूप में लिखती पढ़ती बोलती है. तो फिर हिंदी सीखने में क्या बुराई है?

यदि माँ बाप हमारे पहले रिश्तेदार और गुरु हैं तो मातृभाषा हमारी पहली सखा-सहेली है जिसका हाथ पकड़ कर हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं, मस्ती मज़ा करते हैं, रोते गाते हैं, लड़ते झगड़ते गुस्सा करते हैं और इसी के भरोसे ज़िंदगी के आड़े-तिरछे रास्तों को पार करते हैं। यदि ये साथी कहीं फिसला तो समझो आप खुद फिसले!
और फिर क्या आप एक विदेशी भाषा को अपनाने के लिए अपने सबसे पहले पक्के वाले मित्र का त्याग कर सकते हैं?

Thursday, 27 August 2015

कुछ उद्गार मेरे फेसबुक पेज से……… 

डर
घर से निकलते हुए वो डरती है,
घर से निकलते हुए वो भी डरता है, 
कहीं बस में, मेट्रो में कोई लड़का इधर उधर छू ना दे,
और वो सोचता है कही मेरा हाथ किसी महिला से छू ना जाये,
ऑफिस में किसी सहकर्मी के सरकते दुपट्टे पे नज़र ना अटक जाये,
वो डरती है कहीं मीटिंग में पल्लू कंधे से ढलक ना जाये,
कहीं उसकी मुस्कराहट को आमन्त्रण ना समझ लिया जाये,
वो हर पल सावधान है कि दोस्ताना मदद एक अश्लील कोशिश ना कहलाये,
वो देर होने पर भी बॉस से लिफ्ट नहीं लेती,
वो दोस्त होते हुए भी लिफ्ट ऑफर नहीं करता,
वो मुसीबत में भी किसी से मदद नहीं मांगती,
वो किसी लड़की को देर रात बस स्टॉप पे अकेला देख भी मदद नहीं करता,
वो एक शरीफ़ घर की लड़की है,
वो भी एक शरीफ घर का लड़का है,
वो डरती है उसके किसी काम से परिवार की इज़्ज़त ना चली जाये,
वो डरता है उसके किसी काम से वो जेल ना चला जाये!

आप भी इस विषय पर अपने विचारो से मुझे और अन्य सुधी पाठकों को अवगत करा सकते हैं कमेंट्स बॉक्स मे. 

Monday, 20 July 2015

 धंधा मंदा तो गुस्से में बंदा !

'हाँ भाई, जल्दी बोल के चाइए तन्ने! थैली लाया है ना, येल्ले आपणा दूध.…खुल्ले पैसे ना लाया तू आज भी, चल बाकी के पैसे पकड़!' चार सिक्के खन्न से काउंटर पे गिरे. 'भाया अब जरा साइड को होल्ले।'
'हाँ जी मैडम जी ये लो दही, छाछ और दूध. आपके बने 107 रुपये और ये लो बाकी 13 रुपये,' सिक्के दही-दूध से गमकते काउंटर पर लगभग फेंकते हुए दुकानदार बोला.
'क्यों भाई, आज बहुत गर्मी है क्या?' मैं ने हलकी मुस्कराहट के साथ उस से पूछा।
'ना मैडम, आज ते घणी बारिश हुई सै. क्यों पूछ रही हो आप?'
मैं ने पहले पीछे मुड़ के देखा, कोई लाइन में खड़ा ना देख मैं ने कहा, 'भाई, आप गुस्से में क्यों हो आज?'
'ना जी, गुस्से ना हूँ जी!' थोड़ा शर्मिंदा होते हुए वो साफ़ काउंटर को कपड़ा मारने लगा।
'वो लोग खुल्ले पैसे ना लाते फिर झिकझिक करते हैं, धंधा ख़राब होता है मैडम। जगह-जगह डेरी खुल गयी है तो धंधा वैसे ही मंदा चल रहा है.'
'अच्छा भाई, एक वैनिला आइसक्रीम की ब्रिक और एक बड़ा चॉकलेट कप दे दो.' मैं ने डेढ़ सौ रुपये उसे और पकड़ाए।
'चॉकलेट कप तो आज है ना मैडम, और कोई दे दूँ?' वैनिला ब्रिक को मेरे बैग में डालते हुए दुकानदार ने पूछा। ग्राहक को खाली हाथ लौटाना धंधे के उसूलों के खिलाफ है ये उसके अंदर का व्यापारी अच्छी तरह जानता था।
'तो जो आप को पसंद है वो ही दे दो आप.'
'तो मैडम, आप ये नया मैंगो संडे ले जाओ, बहुत टेस्टी है.'
'ये लो भाई, आज ये मैंगो संडे आप मेरी तरफ से खाओ, चिल करो और वादा करो कि अब गुस्सा नहीं करोगे, पैसे और सामान ग्राहक को फेंक के नहीं दोगे!'

Sunday, 19 July 2015

बारिश 

क्या होती है बारिश?

आकाश से टिप टिप टपकती चांदनी सी बूँदें,
और भीगी मिट्टी की सोंधी महक है बारिश,
काले बादलो के साये तले झाँकती झिलमिल अरुणिमा,
झूमते पेड़ों की लहलहाती पत्तियों की सरसराहट,
भीगे पंछियों का पंख झटकना, फड़फड़ाना,
और बिजली कड़कते ही बच्चे का डरकर माँ से लिपट जाना है बारिश.

क्या होती है बारिश?
                           Image courtesy: forum.chatdd.com

नदी-नालों में तैरती नन्ही मछलियाँ है बारिश,
और पानी से सराबोर नाली में तैरती कागज़ की नाव,
खिड़की से हाथ बाहर निकाले चुन्नू की तरबतर कमीज,
नहर के पानी में डुबकी लगाते नौजवानों की खिलखिलाहट,
घास में कीड़े-मकोड़े चुगती चुलबुली चिड़िया की चूँ चूँ,
और सूखे पेड़ों पे उगती नई कोपलों की उमंग भरी किलकारी है बारिश।
                                   Image courtesy: flickr.com

क्या होती है बारिश?

सवारी को मंज़िल तक सूखा पहुँचाते रिक्शावाले की अपने सूखे हाड़ को
छिदे हुए प्लास्टिक से ढकने की नाकाम कोशिश है बारिश,
किसानों के मुरझाये चेहरों की मुस्कान है बारिश,
चाक में बहती मिटटी के संग बहते कुम्हार के अरमान है बारिश,
छाते बनाने वालो के धंधे की शान है बारिश,
गरीब की खपरैली मड़ैया की टूटी छत से बहती अविरल धार है बारिश।

क्या होती है बारिश?

कोयले की आँच में भुनते भुट्टे की मीठी खुशबू ,
नई फसल का टखने भर पानी में रोपा हुआ धान है बारिश,
सरसों के तेल में डले मिर्ची-प्याज़ के पकौडे और
अदरक-इलायची वाली मसाला चाय है बारिश,
एक ही छाते तले सिमटते प्रेमी-युगल की उंगलियो की नर्म छुअन
और दिल में सुलगते अनूठे अहसास है बारिश।

क्या होती है बारिश?

बचपन की बिसराई यादों का यकायक फिर उमड़ आना है बारिश,
किसान के बच्चों की उम्मीद है बारिश,
नए नवेले ख्वाबों का राग है बारिश,
जाने कितने शायरों की नज़्म है बारिश,
प्यासी धरती की बिछड़ी सखी है बारिश,
समझ सके जो, उसके लिए जीवन का संगीत है बारिश,

दुनिया बनाने वाले की मेहर है बारिश!

Thursday, 9 July 2015

What's wrong with Hema Malini's tweet about the father of the deceased girl and driver of Alto car not following traffic rules?
That it is a tweet!
And media!
Most people, and media of course, believe that it was actually Hema Malini's driver who was overspeeding and are accusing her of deserting the girl and other injured people, although the facts are yet to be verified by the police.
Media was guilty of hyperventilating then, as usual.
For more eye balls and TRP.
Hema was also injured in the accident and hence she can't be blamed for not taking the girl and her family members to the hospital with her. It was the duty of those escorting her to hospital, to have taken the other injured to the bigger and better equipped Fortis hospital, instead of wasting precious time by taking them to the smaller Dausa hospital.
But media chose to hold Hema responsible for the little girl's death.
Of course it was her car and her driver, so she should have instructed him to be careful and drive within speed limits, for their own safety too. But media and public should have been empathetic to her also, not because she is a celebrity politician, but because she was also injured and dazed.
Media is equally guilty of hyperventilating now.
In hospital, Hema and her family were reported to have offered all help to the aggrieved family.
Out of hospital, Hema Malini tried to clear her name by speaking up against the deceased girl's father in media.
And media, as usual, lapped up her tweet.
For more eye balls and TRP.
Moral of the story: Jo bhi karna hai kar, just don't share with media or on Twitter!

#HemaMaliniAccident
I watched this year's IAS topper Ira Singhal's interview with Ravish Kumar two days ago on NDTV.
Many congratulations to the gutsy girl and her parents!
A very inspirational story of strong will power and dedication but a few of her statements struck a discordant note :
1. She doesn't read Hindi newspapers, ' ye to aise Hi hain' but her educated English-speaking Mom reads. 
2. She reads only English novels and would never throw them away but she has thrown away her text and
reference books after getting selected in IAS as the books have no use any longer
3. Her belief in astrology and that she will definitely become IAS.
4. Her statement that she has roamed around the streets of Delhi with her girlie gang or mixed groups till 4 in the morning and the city is very safe....Good of her to say that but when she said 'ye to ladkiyo ke apne oopar hai ' she also displayed the same misogynistic outlook that tells women and girls to dress up in a particular manner to not 'invite ' and 'ask for ' getting molested and raped.
Now to presume that she said this so that females are careful about their safety, how safe is roaming on city streets all night for not only females but males too? Armed robberies and murders, if not molesation and rapes, can always happen anywhere !
And did her english newspapers and news channels never report rape of infants and old women ?
To think that women with such elitist and confused state of mind are toppers and our future policy makers whose dream it is to serve the nation and its women....
What say guys and especially girls?

Friday, 3 July 2015

DILEMMA
As a starry-eyed young bride, fresh out of grad college, Naina was setting up her marital home in a new city, far away from the cosy cocoon of her parental home.  Despite the initial excitement and euphoria of rituals, celebrations and honeymoon at a plush south india hill station resort, she had butterflies in her stomach as she alighted at the railway station with her husband of fifteen days.
Pampered as a little princess, Naina-literally the apple of their eyes-had been supported by her parents in all her hobbies and interests. A curious knowledge seeker, an avid reader and a keen debator, she had always been an assertive but not overly aggressive person. Despite being a stauch supporter of female independence, she pursued a balanced outlook towards her marital life. So when her in-laws seemed rather unwilling that their daughters-in-law pursued a job, she accepted their suggestion to remain a homemaker.
Arranged marriages are not the best in terms of pre-marriage interaction between a girl and a boy. Naina also had her share of apprehensions and misgivings about life with her new  husband. But moments of love and laughter, misunderstandings and disagreements spiced up their life. Fun and fury took turns to remove monotony and dullness. Swallowing their ego, smiling, apologizing and making up to each other irrespective of who was wrong, brought them closer.
He was her family now.
But she still missed her family.
It was not the era of mobile phones or computers. Letters brought news of happy and sad occasions, ailments and awards, celebrations and mournings. She longed to be with her family-her parents and her siblings, their families on all such occasions. Physical distance could not distance her heart from them. She regretted her inability to be with them, share their joys and sorrows, nurse them in their old age.
It's not that her husband prevented her from visiting them, societal norms frowned upon married daughters visiting their maiden home frequently.
Life went on. Children strengthened the bond between the couple.
With the passage of time, a lot of things changed. Mobile phones and video chats bridged the distance between people, across cities, nations, continents.
Naina and her husband brought up their daughter and son as equals. Both acquired professional degrees and became self-sufficient. Both were imparted all necessary life skills-cooking, cleaning, washing up, buying groceries. Both were given the freedom and the skills, and encouraged to take their own decisions whether they were regarding their profession or their life partner.
Times had really changed.
Or had they?
Daughters leaving their families after marriage had not!
When it was time for her daughter to take a crucial decision regarding her marriage, Naina was in a dilemma.....should she 'give away' her daughter in 'Kanyadaan' to a man who was her equal in every sense-education, profession, salary, wisdom? Should she really encourage her daughter to forget her family in order to embrace her new family? Or should she hold her daughter close, not motivating her to bond with her marital family lest she should forget her own parents? Would her son-in-law treat them as his new parents and support them as a son would?
Shouldn't she guide her daughter to strike a balance between her two families?
But a few years down the line, would she be able to refuse 'Kanyadaan' for her daughter-in-law too? Would she be able to encourage her son's wife to devote equal time to her parental family too? Would she be able to guide her to strike a balance between her two families? Would she encourage her son to treat his wife's parents as his own and support them as a son would?

Equality demands equality between husband and wife.
Equality demands equality for sons and sons-in-law.
Equality demands equality for daughters and daughters-in-law.

Would Naina dare...to take the Road Not Taken?

More importantly, would the new generation dare?





Wednesday, 24 June 2015

June 25, Two Memories

June 25, 1977, a child's first impressions

As a spunky and politically aware pre-teener, when i heard from my grandfather that emergency had been imposed in the entire country, it jolted me no end. I was a child raised on the heroic tales of the 'Iron Lady'. Now the same iron lady had exercised her iron will to snatch away the freedom of 'free citizens of a free country' and put iron shakles around their lives. . My newly awakened mind rebelled against the thought and i would often engage my grandpa in a debate about its ramifications. 
One night, as we all gathered for our daily session of family +news watching+dinner+discussion time, the neighbors-hardcore congressis-also joined us for their share of common TV time. The newsreader announced in his routine singsong tone that a few opposition leaders and journalists had been arrested for conniving against the govt. The feisty rebel in me was aghast at the 'news' and i stood up in agitation to launch a diatribe against the govt. My grandpa shushhed me immediately, the neighbors looked on curiously. I was whisked away to another room and scolded for my misdemeanor of ranting vociferously before the neighbors, "beta, deewaro ke bhi kaan hote hai aur aap to khule aam sarkar ki buraai kar rahe ho! Agar baat fail jaaye to sabke liye museebat ban sakti hai!"

June 25, 1983, Cricket World Cup Finals

India, the underdogs reach the finals of Cricket World Cup! The news had exhilarated all indians beyond imagination. Taking on and winning world cup against mighty West Indians was a wild dream not many of the fiercest optimists had. Stakes were always high in favor of the invincible Windies.
But when the unimaginable happened at Lords- the Home of Cricket, the whole city of Delhi erupted in rejoicing, celebrating, cheering for the ultimate win. Sparklers lit up the midnight sky and firecrackers announced the new world champions. The heady sight of a feisty captain proudly holding aloft the gleaming trophy and sprinkling the bubbly champaigne on the elated fans is a sight cherished for life.
Literally jumping with joy, we cousins attacked the aunt's kitchen and fridge to celebrate with something sweet. Nothing to be found! My elder cousin suggested we rustle up some quick kheer or halwa but nobody wanted to leave the TV screen for that long. Some Cheekus-which i dislike immensely and would have never eaten otherwise-had to do the honors finally. The aroma and taste of those luscious cheekus is still fresh on my tongue and heart.....only because of that first world cup win.

Tuesday, 23 June 2015

A Close Bond

A few years ago, while teaching a piece of poetry to adolescent ninth graders, i happened to ask them if they would like to share something about their family life.
Their response was virtually a glut of emotions....a normally reticent child spoke of his difficult life at home with his new dad and his beautician mother, another narrated his grandpa's funny eccentricities, a girl hesitatingly confided how her mother had deserted her a few years ago, another girl's parents had expired in an accident and she lived with her grandparents and uncle's family, a boy spoke of his parents' expectations from him........ As they opened up their hearts, we became one-they were no longer students and i not their teacher!
The usually boisterous class fell silent, not a pencil dropped, no scratching of pens, no pulling or creaking of chairs...the unveiling of so many diverse emotions helped ease out the hesitation in the other children. Many eager hearts seemed ready to burst out their secrets.
I shut the door to drown out the noise of passing feet and children playing in the playground.
A few minutes later, another student-a new admission-stood up to reveal his family story. Originally from Kumaon, his father had struggled much in life, got education with much difficulty and now he wanted to provide his son and daughter the best education posible within his limited means. While sharing his father's dreams, he suddenly burst into tears! His friend sprang to his feet immediately and hugged him to steady his heaving frame. I too rushed to him and calmed him down. Others looked on-concern and empathy writ large on their faces.
The bell rang. It was recess. Not one student cheered or rushed out of the class. That one hour of shared joys and sorrows had erased the differences and diversities of status, caste, religion, gender......
Many more such moments followed.......they fought amongst themselves, had crushes, family problems, growing up issues, tussle with the management, fights with students from other classes. Many a times PTMs turned into Parents' Training Meet, i would be counselling parents rather than their wards.
Sometimes, when i was feeling down and out, they could sense it almost involuntarily.......a smile here, a word of concern there and an offer for help would lift my sagging spirits within no time.
Two years flew away. They were to appear for their boards now and were more serious towards their studies and career. It was at this point that i realized they had grown up so fast and some were now going to move away to other schools, ending 6-7 years of constant togetherness.
This poem was an outcome of such intense moments when a close bond was forged between the teacher and taught. With some of them, the bond still goes strong!
Here is the poem:
To Children......With Love!
It seems like yesterday when
They walked into my playpen,
The flock-young and naive, some hesitant and nervous,
Some confident and full of smiles.
One held my hand,
Another told the story of Lion King Grand,
Yet another climbed the window to swat a fly,
His friend hid under the desk to escape my eye.
And thus began the story of our friendship.
Of sharing sweets, chocolates and spicy chips,
Of graduating to A for Absent and B for Bunking,
Gradually learning the ABC of a Happy Life.
Lovingly I presided over my brood,
And helped them find
The difference between rude
And refined.
Together we learnt to love, enjoy, share and care,
To accept dislike, disagreements and failure,
To deal with anger, disappointment and despair,
All things in life, fair or unfair.
It's amazing how time flies!
The flock too, is now matured and ready to fly,
Raring to touch the heights of the skies,
It's time to loosen the strings, let go and bid good-bye,
Wishing them all the best,
To do well in all their life tests,
With courage, grit and determination,
And bring laurels to themselves, their family and nation.

Sunday, 14 June 2015

THE FULL MOON

He could give up anything in the world to see a smile on her glum face again. She would dutifully come to meet him, every month. She would bring his favorite food, enquire about his well being, studies and keep staring blankly at the dusty calendar on the sour cream walls of the meeting room.
He had been there for the past nine months, in the juvenile home.
Convicted of murdering his own father.
His father! Drug addict and peddler, alcoholic, thief, begger, pimp, sadist......
The narrow alleys of their street would often reverberate with the cries of a hapless woman. Even the morning sun failed to penetrate the foggy skies to bring some cheer to the frail woman who tried to hide the scars on her body and soul, howsoever unsuccessfully, from her teenage son.
Another dark night, another wail rent the air, blinded with rage the boy grabbed a sickle and hit. His father collapsed. A puddle of blood slowly trickled out of the tenement.
The boy called the police with his father's cell phone.
Juvenile court sentenced him to one year in a correction home.
His mother's droopy mouth slumped even more. Uncertainty and apprehensions over her son's bleak future made her scarred face gloomier.
He urged her to resume work and be happy, she feigned a smile which did not reach her eyes.
After an agonizing 12 months he came home. She rejoiced briefly, then fell silent.
That night, as she lay awake on a shabby rag unable to blink an eye, she heard someone croon a lullaby.
She froze in her mediations. Then slowly turned to see her son sing the lullaby she used to sing to rock him to sleep.
From behind the lead skies, her s(u)n was born again!
The droopy mouth lifted, and then she smiled......radiant like the full moon outside.

Sunday, 31 May 2015


Love In No Smoking Times



Going down on his knees, a rose in hand, he proposed shyly, "Will you marry me, Radhika?
"Yes, i will!" She replied with an equally shy peck on his cheek.
"Oh my my! This is your first gift to me in one year of our togetherness.....i am honored!"
"Thank you, thank you, the pleasure is all mine!" Recovering quickly from a sudden burst of emotions, Radhika bantered lightly," But where is my first gift?"
He just smiled, enigmatically, "You will get it soon!"
What Radhika had not noticed was an unopened pack of Marlboro, discarded in the wastebin beside his study table.


#WorldNoTobaccoDay 

Friday, 29 May 2015

बेटियाँ 

  
कुछ शक्कर सी मीठी,
कुछ नींबू सी खट्टी,
कभी नीम सी कड़वी,
तो कभी मिर्ची सी तीख़ी, 
अभी फूलों सी इठलाती,
और अभी शेरनी सी दहाड़ती,
एक पल बच्ची सी मुस्काती,
दूसरे ही पल दादी सी डाँटती,
कभी भाई से लड़ती,
कभी पापा से लड़ियाती,
अम्मा के भजन पे कान बंद करती,
मम्मा के संग रॉक एंड रौल करती,
नानू को कंप्यूटर सिखाती,
दद्दू को चैस में चेैकमेट करती,
गली क्रिकेट में छक्के लगाती,
कॉलेज तक कार भगाती,
गुंडों को सबक सिखाती,
नन्हें पंछी के पंख सहलाती,
एक ही ज़िंदगी में कितने रंग दिखा जाती,
पर फिर भी हर जगह पानी में शहद सी घुल जातीं,
बेटियाँ !
A Nano Tale

Finally, I convinced myself to do it. Tonight it had to be sacrificed. Picking up the knife, I inserted the gleaming pointed steel into its voluminous abdomen and sliced out a big chunk off its juicy flesh. A heady smell made my nostrils flutter with happy anticipation ...with an obvious tinge of sadness, too. As I scooped out the golden flesh, a sigh escaped my lips.
The mixer whirred and minced the perfect cubes to a gooey slush. A dash of honey, a pinch of saffron and a glass of milk....and it is whipped to perfection.
A glass of enticing mango shake.....with the last mango from the last remaining mango tree in our garden.

   
                                       Image courtesy: tumblr.com

Thursday, 28 May 2015

ODE TO NIGHT


A warm still night,
A pale, waning moon,
With its dull, restless light,
Engines buzzing on like some loon,
The lone warbler crooning in mid-flight,
And a sonneteer, still bright eyed as if it's noon,
Putting the stamp of his ink on paper, clean and white,
Far away, a solitary lover trills a song, although not in tune,
Hope of reconcilliation with his beloved, in his heart burning bright,
Lady Luck, Lady Love and her lofty laughter will again be his, very soon.

Monday, 25 May 2015

What's Your Spirituality Quotient
As a kid, i often saw people organizing religious rituals at home and a bhandara-a community kitchen after that. The practice has become even more prevalent today. Tuesdays, thursdays, saturdays....you will find poor people thronging temples in long snaking queues to get their share of poori-sabzi, bread pakora, khichri, halwa etc. Random festivals and special days also ensure distribution of food. And this is not limited to Hindus only. A few weeks ago i happened to pass by a mazaar and noticed devotees and poor people partaking of food in the bhandara there also. Perhaps my knowledge about existence of this practice among Muslims is limited but this was something that broadened my spiritual horizon and set me thinking.
Is it a genuine sense of sharing and caring for the poor and needy? Or is it the fear of suffering in the next birth duly inculcated by their respective religions, just an easy attempt to get rid of the impact of their misdeeds in their present life and a desire to attain salvation and heaven in their afterlife that makes people involve themselves in some philanthropy?
And then, today i received this daily message from a spiritual messages app that i follow.
"You can only give away what you already have inside yourself.
True giving happens when you are overflowing from the inside, and cannot help but share. When there is so much love within you that it has to flow to others or you would burst open. There is no thinking involved, no willpower in such sharing. It just flows out. If you have to force yourself to be kind, to love, to feel compassion, you've missed the first step of filling in your own self with these emotions."
My personal belief is to live in the moment, in sharing whatever little you can, irrespective of what is going to happen in my afterlife.
What's your spirituality quotient?
Please share your thoughts..

Monday, 18 May 2015

The Conversation

As i waited for the long line of peak office time cars, bikes, rickshaws, chartered buses to recede so that i could cross the road to the shopping complex on the other side, i noticed her.
A frail old woman trying to cross the road, then hobbling back as a biker almost drove over her. Instinctively and inconspicously, i moved to her side to protect her from the surging traffic and help her cross over. She noticed me by her side and asked if i was also going to the market and if i could help her cross. As the traffic slackened a couple of minutes later, i held her by the shoulders and indicated to the car drivers on both sides to slow down. On the other side of the road as i gave her my hand to get on the footpath, she thanked me gratefully. I asked her if she wanted to buy some milk from the Mother Dairy and offered to buy it for her. Panting due to the effort of walking, she told me that she had to get milk as well as vegetables. As we crossed another road, i held her steady on the potholed road and gestured to the car drivers to wait a few seconds.
Very politely, i queried why she didn't get grocery, milk and veggies etc delivered from the store inside the society itself, she said that she didn't have any phone. I don't know what came over the lady suddenly, she started confiding in me how her son and daughter-in-law were troubling her. In a feeble voice, she spoke about her illnesses, her childhood, her parents and her happy and comfortable life with her husband of 48 years. She told me how loving and caring her son was in his childhood and what hopes they had from him. But after his marriage, circumstances changed.....he started pestering the mother for disposing off their properties and giving him the money. Her thoughts were all muddled up.....but she spoke quite coherently.
I was a bit embarrassed to hear all this, a stranger as i was for the lady although we happen to reside in the same society. With vehicles screeching and honking all around, i couldn't hear all that she kept on babbling but her tearfilled eyes conveyed her inner turmoil and predicament. I wished to move away, having reached her till the Mother Dairy booth, but the despondence in her eyes held me back. I stayed with her a few more minutes till she fell silent, except for the heavy breathing. Gently, i asked her if she wanted me to wait for her, but she politely declined my offer. 'It is my destiny, i have to bear it.' I told her to take a rickshaw home and moved towards the market in a pensive mood.
Generation gap, communication gap, lack of mutual understanding and tolerance, too many expectations from children, different aspirations and lifestyle, acceptance of disagreements as part of life.......that brief conversation with the gloomy lady-or rather her monologue left me wondering........what is it that makes parents and children drift so far apart that life becomes hell.....perhaps for both!

Thursday, 30 April 2015

Flame Of The Forest

                                          Pic courtesy:imgkid.com

Flame Of The Forest

Long winding metalled roads, merging at a cross
Deserted, black as a clean black slate,
Away from the sophisticated, urban, maniacal chaos
The lone traveler's steps lose their spate,

Stand still the boundless, bare trunks of autumn trees
Echoing the desolation of a forlorn heart,
Deceived, deprived, overwhelmed with a conceited noise
When a solitary yellowing leaf offers an enticing bait,
Beckon him strings of sunny yellow Laburnum blooms
Flames his wan affections-the red Flame of the Forest,
A sudden wild cry of a lovelorn bird breaks the stillness
The warbler fluffs his wings, breaks into a swift flight,
Setting in motion the stalled engine of suppressed desires
A mysterious chord strings music in a life bereft,
To his aimless life, his choice will make all the difference
The traveler moves on-his steps firm and resolute.

Wednesday, 29 April 2015

लव इन ऑटोरिक्शा टाइम्स

हे रिक्शावाले, राजपुर रोड चलोगे?
बैठिये मैडम।
आप जॉब करते है क्या मैडम? पर आप यहाँ की तो नहीं लगती।
हाँ. मैं दिल्ली की नहीं हूँ. यहाँ न्यूज़पेपर में रिपोर्टर का काम करती हूँ।
मैं भी किसी को जानता हूँ जो हमेशा रिपोर्टर बनना चाहती थी.
अच्छा! कौन, कहाँ?

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी,
नज़र के सामने घटा सी छा गयी....

ऍफ़ ऍम पे बजते गाने के सुरों के साथ कुछ पुरानी यादें भी उमड़ आईं।

रुद्रपुर में, मैडम। रजनी, हमारी दूर की भाभी की बहिन थी. हम गए थे बरात में, वहीं मिली थी. वो तब सत्रह साल की थी और हम बीस के।
रुद्रपुर? रजनी?
हाँ मैडम। यूँ ही फेरों की अग्नि की लाल-पीली-नारंगी रौशनी में हमने भी कुछ सतरंगे सपने देखे थे।
फ़िर ?
फिर क्या मैडम? हम ठहरे अनाथ जिसका आगे नाथ ना पीछे पगहा, पढाई पूरी हुई ना थी और पैसे-लत्ते का ज्यादा कोई जुगाड़ था नही. सो भइया ने जब शादी की बात करी तो हर तरफ़ से ना ही सुनने को मिली। दिल पे झटका लगा तो फिर हम भी चले आये शहर.
और ये ऑटो?
यहाँ आकर हमने पहले अपनी ग्रेजुएशन पूरी करी और अब इग्नू से एम बी ए कर रहे हैं. ये ऑटो तो हम पार्ट टाइम चलाते हैं, फ़ीस और खर्चे पानी के लिए.
पर तुमने उस लड़की से उसकी मर्ज़ी कभी नहीं पूछी? कभी पलट कर वापस नहीं गए?मैडम, हमारी तरफ़ की लड़कियों की ज़ुबान ही ना होती तो उनकी मर्ज़ी कौन पूछने देता? पर जैसे ही हमें एक अच्छी नौकरी मिल जायेगी, हम जाएंगे जरूर !
और तब तक अग़र उसकी शादी हो गयी तो?
नहीं मैडम, अपनी क़िस्मत इतनी भी ख़राब नहीं हो सकती. वो हमें मिलेगी ज़रूर. लीजिये, आपकी मंज़िल आ गयी.
और तुम्हारी मंज़िल, विनय?
मेरी मन्ज़िल....विनय....आपको मेरा नाम कैसे मालूम?

क्यों पहचाना नहीं अपनी रिपोर्टर रजनी को, इतना ही भरोसा था अपने प्यार पे?

और आप सभी प्यार करने वालों के लिए हाज़िर है एक और टाइमलैस क्लासिक.… आर जे नितिन की ओर से.….

कबके बिछड़े हुए हम आज कहाँ आ के मिले,
जैसे सावन से कभी प्यासी घटा छा के मिले....



Wednesday, 15 April 2015

तुम कब लौटोगे? 

अब तो फ़रवरी के कुहसाये दिन और सर्द रातें भी इतिहास हो गयीं. मार्च में छितराये होली के रंग भी फीके पड़ चुके. . बच्चों की परीक्षाओं के परिणाम आ चुके, नए साल की पढाई भी शुरू हो गयी. बजट सेशन ख़त्म हो गया, लैंड एक्वीजीशन बिल पे झगड़ा-धरना-प्रदर्शन भी हो चुके और प्रधान मंत्री अपना भारत प्रवास समाप्त कर वापस यूरोप जा चुके. पर तुम ना कहीं दिखे. लोगों के चेहरे से मुस्कान गायब है, मायूसी अपने पैर चारो ओर पसार रही है. कुछ दूरदर्शी खोजी आँखें भी तुम्हारे ठौर ठिकाने ना जान पा रहीं सो अब तो ना टी वी देखने में, ना अख़बार पढ़ने में वो मज़ा है. यूँ अपने चाहनेवालों को धोखा दे कर तुम अचानक कहाँ चले गए? यहाँ तक कि तुम्हारे वियोग से व्याकुल आकाश में बादल मचल मचल कर आँसू बरसा रहे हैं, पेड़ों पे नई कोपलें तुम्हें देखने को बेक़रार हो रही हैं और लू ने अपने रंग दिखाने से मना कर दिया है. विरह पीड़ा से त्रस्त इंटरनेट योद्धाओं की चुटकुलों की दुकान बंद होने की नौबत आ गयी है.
आखिर तुम कहाँ हो, कब लौटोगे?
अब तो लौट आओ, राहुल!

Monday, 13 April 2015

नक़ल की अक़ल या अक़ल की नक़ल 

देखो जी, इसमें बहस की कोई गुंजाइश तो है नहीं कि आउटसोर्सिंग के किंग तो हम इंडियंस ही हैं!पहले हमारे टीचरों ने अपनी टीचिंग जॉब दूसरे टीचर्स को आउटसोर्स की, ऑफ़ कोर्स थोड़े से कमीशन के बदले! फ़िर स्टूडेंट्स ने अपने गुरुओं के पद चिन्हों पे चलते हुए अपने असाइनमेंट्स/प्रोजेक्ट्स आउटसोर्स किये कुछ स्पेशलिस्ट्स को। और फिर उनके माँ-बाप ने बच्चों के एग्जाम में हेल्प आउटसोर्स की कुछ भाई लोगों को.…आख़िर बेरोज़गारों की रोज़ी रोटी भी तो चलनी चाहिए ना! अब भइया जी, नया ज़माना है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि गुरु गुड रह जाए और चेले शक्कर हो जाएँ .... तो अब टीचर्स ने भी अपनी बोर्ड एग्जाम ड्यूटी यानी कॉपी चैकिंग की ड्यूटी भी आउटसोर्स कर दी है.... क्या हुआ जो बारहवीं के एग्जाम पेपर्स चेक करने वाले स्कूल के चपरासी और क्लर्क हैं.…या फ़िर इंग्लिश की कॉपी संस्कृत वाले और हिंदी वाले टीचर मैथ्स की कॉपी चेक कर रहे हैं, टीचर तो भगवन का रूप होते हैं, बच्चों के साथ नाइंसाफी थोड़े ना करेंगें! 

#IndianEducationSystem

Sunday, 5 April 2015

Fair And Lovely

फेयर एंड लवली

वो थी एक ख़ूबसूरत लड़की
फेयर एंड लवली सी,
भोली-भाली और कुछ शरमाई सी,
संजोये थे जिसने चंद सपने बचपन से,
सब की तरह कुछ बनने-बनाने के,
कुछ ट्रॉफी और कप जीत के लाने के,
और वाक़ई सच हुए उसके सपने सारे,
कप भी मिले,
सोलह साल की बाली उम्र में
शादी के बाद कप भी मिले ढेर सारे,
और मिले धोने को प्लेट्स-ग्लास-चम्मच-कटोरे,
तवा, चकला-बेलन, कढ़ाई-कुकर,
पंद्रह सदस्यों के परिवार के लिए
चार वक़्त चाय-खाना-नाश्ते बनाने खिलाने में,
सचमुच सच हुए कुछ बनने के सपने,
बीस साल की नन्ही ज़िंदगी में
तीन नन्हे-मुन्नों की माँ बन के.
फेयर एंड लवली, भोली-भाली, शरमाई सी एक लड़की,
अब अनफेयर-अगली, स्क्रीमिंग-शाउटिंग चिड़चिड़ी माई!
एक और छोटी सी प्रेम कथा 

हाँ हाँ मुझे याद है मैंने वादा किया था. मुझे पता है ये ग़लत है.
मैं जानता हूं ऐसा करना सख़्त मना है पर क्या करूँ कंट्रोल नहीं होता!
नहीं, अब और नहीं, पहले ही बहुत ज्यादा हो चुका है, अब कल के लिए भी कुछ छोड़ दे बेवक़ूफ़.
सिर्फ़ एक, खा लेता हूँ सिर्फ एक काजू कतली और! क्योंकि ये दिल है कि मानता नहीं!

लव इन मिठाई टाइम्स


Thursday, 2 April 2015

Siddhi

LONELY GIRL IN THE CITY
Siddhi
She got up, dusted her clothes and picked up her pooja thali from the road. 
It was the last day of Navratri and Siddhi had gone to the temple to pay her obeisance to her guardian-angel, Goddess Durga. She had moved to this city only recently for a new assignment. Her parents had been a bit wary and advised her to be careful while moving around in a new city.
The temple had a long queue of devotees and it had taken her longer than she had planned for. Rushing towards the parking in the nearby office complex, she called up her assistant to keep the documents ready for her perusal and also to reschedule her evening meeting with a new client.
A press on the remote unlocked the car doors. Just as she was nearing the car, she heard a faint cry. She looked around the few vehicles parked there but saw nobody anywhere in the desolate parking, closed as the offices were on the weekend. Shrugging off the sound as her delusion she opened the rear door to keep her pooja thali.
Then she heard it again. A muffled call 'someone help' alerted her. With tentative steps, she moved towards the nearest car-a black SUV parked a few meters away. Just then a hand banged on the window glass from inside the monster vehicle. Siddhi flipped open her cell phone and dialled 100 with trembling hands. And spoke in a clear firm authoritative voice.
Then the door opened and a young girl fell out. A burly middle aged man jumped out and pounced on her. The disheveled state of the girl and her perpetrator left no doubt in Siddhi's mind about her next move.
A brass pooja thali hit the oppressor on the head as he bent down to pick up his terrified victim. A fistful of vermilion blinded him and a sharp war cry deafened his ears.....he doubled up with pain from the mighty booted kick in his shins. Sidhhi dragged the semiconscious girl to her feet and dealt a powerful blow in the pervert's groin to finally knock him out.
Both girls spat at him. And smiled faintly. The siren from the police van could be heard closeby.
Chants from the temple floated in the wind......
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

Wednesday, 1 April 2015

दुनिया के बीस सबसे दूषित शहरो में है
दिल्ली-हमारा शहर, हमारी राजधानी,
ताउम्र अपना पैदायशी हक़ समझा जिसे,
आज महंगे दामों बिकता है वही हवा और पानी।
लव ऐट लाल बत्ती
कल तू आ रही है ना?
कहाँ, वहीं मेट्रो स्टेशन पे?
नहीं रे, कल तो मंडे है, वहाँ बहुत भीड़ होगी। हुमांयू के मक़बरे पे चलते हैं.
नहीं नहीं, मक़बरे में नहीं!
क्यों? वहाँ तो इतनी हरियाली है और कोई भीड़ भी नहीं होगी।
इसीलिये तो!
क्या मतलब?
शहर की भीड़-भाड़ में धक्के खाते हुए, गाड़ियों का धुँआ फांकते हुए भी एक-दूसरे की धुंधलाई आँखों में खो जाने का सुख हरे-भरे बाग़ की ठंडी हवा में कहाँ!
सही कहा तूने. पेड़ों के चक्कर लगाते हुए गाना गाने की तो ना उम्र रही ना इच्छा। अब तो चाँद तारो की जगह ये ट्रैफिक लाइट की टिमटिमाहट ही ज्यादा मनभाती है.
याद है, यहीं इसी चौराहे पे बीस साल पहले तू मिला था और यहीं लाल बत्ती पे कभी खिलोने तो कभी दिल वाले गुब्बारे बेचते हुए कितनी गाड़ियों के चक्कर काटे हमने। होरन की पीं पीं के शोर में ही दिल की कितनी बातें बाँटी थी।
और इसी गोल चक्कर के चक्कर लगाते लगाते हम भले ही बूढ़े हो चले, पाँव भले ही डगमगाने लगे हैं पर हमारा प्यार आज भी ढला नहीं है.
हाँ रे, यहाँ थमने वाली गाड़ियाँ भले ही आठ फुट से सोलह फुट हो गयी पर गाडीवालों के दिल उतने ही छोटे हैं. बंद शीशों के अंदर से उन्हें हम गरीबों के रिश्ते भी बिन्नेस ही नजर आते हैं.
चल छोड़, अपने इसी प्यार के नाम पे अपनी डेट फिक्स, कल फिर से यहीं इसी लाल बत्ती पे, लिट्टी चोखा और छाछ के साथ! .
धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले..........सुन ना ले कोई सुन ना ले।





  

Tuesday, 31 March 2015

इन्तेहा 

कुछ वक़्त की कमी, कुछ बदलते ज़माने की दुशवारियाँ,
बेख़बर सी बेरहम सी पल-पल बढ़ती गयी दूरियाँ,
और फ़िर कुछ यूँ हुई हमारी बेसब्री की इन्तेहा,
कि न तो हम रहे, और ना ही उनके कदमों के निशाँ।

Hypocrisy........Mediocrity.......Exhibitionism

#MyChoice video featuring Deepika Padukone....enough already said on multiple media channels, twitter and FB pages, so I wouldn't waste time and energy repeating the same arguments berating the 'my choice' to wear whatever, go wherever whenever, get intimate with whosoever; even outside marriage if you so desire.
One reminder to all such women: A very large number of men are loving and caring family oriented brothers, fathers and husbands who come home straight from their workplace, don't romp around semi-clad, or ogle at every passing female.
How would you react if men in your family started saying 'my choice' to wear whatever, go wherever whenever, get intimate with whosoever, even outside marriage if they so desire?
Who would care for the family, children and the household if both go their own way? Or do you not care to have a family at all?
Remember: You (both men and women) are because your mother chose to have you.
Assertion of your feminity should not make you disregard the gift of nurturing a life within you....it should be cherished because it is what makes you a woman, and naturally accords you a status higher than men.
Ok. You are within your right to choose. But do you honestly need to flaunt your hot bod, cavort on the beach all night or indulge in promiscuity to assert your equality?
Is your feminity so insecure that you have to make it a fight between 'them' and 'us' to establish itself, not a fight against hunger, disease, illiteracy? Or is that too mainstream, too below your dignity to fight for, for your elitist self?
And lastly, why should your assertion of 'my choice' influence other women's-even a five/ten/fifteen year old girl's right of 'my choice'?

Wednesday, 25 March 2015

HOMECOMING
'Baba', the handsome strapping young man bent down to hold the old man's chapped hands.
'Kaun ho, beta (who are you, son)?' the shabbily dressed man with a scraggly beard and salt and pepper hair asked in a feeble, trembling squeak from his rickety bed.
~~~~~~~
Roshan Ali had found a petrified young boy bleeding severely from the head. Sammy had been hiding in the shrub outside Roshan Ali's decrepit one-room tenement. Ali comforted the boy with his kind soothing words and helped him get to his feet. He took the limping boy to his house, cleaned and bandaged his wound and then offered him a glass of milk with a pinch of turmeric.
The boy relaxed gradually and confided in the fatherly man. He belonged to a village in Uttar Pradesh. It was the usual story of a life of penury, of an alcoholic father deserting his wife and four young children, mother struggling to fend for her children and falling ill, the eldest son-a twelve year old-beginning work in a dhaba.
A decent looking man lured Sammy to this city with the promise of better work, better wages and an opportunity to study in a night school.
But the big city pounced upon the hapless child to swallow him in its big bad underbelly.
Pickpocketing, thuk thuk gang, thefts, begging....this was an organized gang which operated like a well oiled smooth machine.
Sammy was threatened, beaten blue and black, starved but he refused to comply with the gangsters' orders. In severe pain, he fell on the ground, unconscious. They kicked at the inert boy, but when the boy failed to respond they panicked. They picked up the badly wounded boy and dumped him in a dense shrub.
Despite coming to his senses, Sammy had not dared to come out for a few hours losing more blood in the meanwhile. In the dead of night, Roshan Ali had heard the groans of the boy and rescued him.
The compassionate and caring man sheltered the weak, frail and terrified boy in his house for a few days, then escorted him to his village. Unfortunately, the boy's mother had vanished from the village with his other siblings without any trace.
Roshan Ali who worked as a driver for a corporate hotshot, was a man of limited financial means yet he decided to not leave the young boy to rot in the village like an orphan. He brought him back to his house and took him to a nearby govt school for admission. Without valid legal documents, the school authorities refused to admit the boy. His boss, an amiable philanthropist, was quite perturbed by the young child's miserable tale and promised to find some recourse soon.
Unfortunately, Roshan Ali had a car accident in his disturbed and anxious state of mind and was sentenced to six months in jail. But to his relief, his kindhearted boss took the distraught child legally under his care and flew him abroad on his next assignment.
That was the last Roshan Ali saw or heard of Sammy. Ten years ago.
~~~~~~~
''Baba, main aapka Sammy (I am your Sammy)! I have come home.... to you. Naresh uncle, my guardian angel, took very good care of me and it is because of his perseverance and your blessings that I was able to study well and get a good job here in India only. We will now stay together, in our house."

Monday, 2 February 2015

Ek Aur Pariwar

एक और परिवार चला आया है.

अपने गाँव की देहरी को एक झटके में लांघ कर,
उथली हो गयी नदी के पाट बाँध कर,
मटियाले पेड़ों की छाया का आराम छोड़ कर,
अपनी कच्ची मड़ैया की टूटी खपरैल,
और गोबर से गंधाती दीवारें छोड़कर,
बच्चों की ताल के मटमैले पानी में छलांगे समेट कर,
उन्मुक्त किलकारियाँ, खिलखिलाते चेहरो की हँसी
एक फटी गठरी में मज़बूती से कैद कर,
क्योंकि सूखी बंजर ज़मीन पे सपने नहीं उगते,
खाली हवा से पेट नहीं भरा करते,
उपलों की आंच में उधार का दानव भस्म नहीं होता,
और गाँव के टीले की चढ़ाई से एवरेस्ट फतह नहीं होती.

तो आज फिर एक परिवार शहर चला आया है.

घरघराती हुई बस की छत पे सपने लादे,
पेट में आग और दिल में सिर्फ़ चंद अरमान छुपाये,
गाँव के पडोसी चाचा के दोस्त का नाम
चुन्नू की कॉपी के एक पर्चे में मजबूती से लपेटे,
और आखिरी कुछ सौ के नोट अंटी में समेटे,
बड़े से शॉपिंग मॉल की झिलमिलाती रंगीन बत्तियों से परे
है 7 ×8 फ़ीट की गुफाओं की लम्बी कतार ,
यही है इन पनियाई आँखों के सपनों की पनाह,
पास की सोसाइटी के चंद घर बने माँ की कर्मगाह,
लम्बी चमचमाती गाड़ियों में दिखती है बाप्पा की मेहनत की फसल,
बहन की धोती में सिमटी टांगो को ढक लिया है
शोरूम की नीली पैंट शर्ट वाली वर्दी ने
और पप्पू के स्कूल के बैग को साहब के ब्रीफकेस ने,
अटपटायी गंवई जुबां पे अब जगह  ले ली है वेलकम सॉरी और थैंक यू ने.

आज फ़िर एक शहरी चश्मे ने गाँव को रंगीन आँखे दे दी हैं.

गाँव का मछली वाला ताल, टीले वाली पहाड़ी, कच्ची पगडण्डी,
लहलहाती मटर की छीमी, अमरुद और आम का पेड़ नहीं तो न सही,
जंगली फूलों पे मंडराती तितलियाँ, सरपट भगाती मुर्गियाँ,
बारिश में भीगे मोर के नीले पंख और चहचहाती चिड़ियाँ नहीं तो न सही,
पेट की आग बुझाने को भरपूर खाना और तन ढकने को साबुत कपड़े तो है,
गाँव की चौपाल और बतियाने को टाइम नहीं तो क्या, हाथ में एक मोबाइल तो है,
कमरे में खिड़की नहीं तो क्या, साहूकार के तक़ाज़ों की लटकी तलवार तो नहीं,
ज़मीन अपनी नहीं तो क्या, सपनों की उड़ान के लिए मुक्त आकाश तो है!

बस गम है तो सिर्फ यही, गाँव में शहर और शहर में गाँव नहीं होता!
कुहसायी रात 

फिर घिर आई वही सर्द कुहसायी रात,
छुपाए अपने गहरे स्याह दामन में,
माक़ूल और नामाकूल से कुछ नए सवालात
कौन देगा हिसाब, किसके पास है जवाबात?

क्या है कोई एक भी यहाँ दूध का धुला,
क्या किसी का है दामन साफ़-शफ्फाक़?
हमें तो अब हर चेहरा चाँद नज़र आता है,
हालाँकि  वो सिर्फ़ चाँद ही है जिसमें दाग़ नज़र तो आता है!